
Water Intensive Crops in India : भारत में उगने वाली कौन सी फसल पीती है सबसे ज्यादा पानी, PC- Chatgpt
भारत में खेती और पानी का रिश्ता बहुत गहरा है। देश में इस्तेमाल होने वाले पानी का बड़ा हिस्सा कृषि में जाता है और सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता लगातार बढ़ी है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में सालाना निकाले जाने वाले 245.64 अरब घन मीटर भूजल में से 87% यानी 213.29 अरब घन मीटर खेती में इस्तेमाल होता है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है। आखिर कौन-सी फसल पानी सबसे ज्यादा पीती है? जवाब सिर्फ एक फसल का नाम बताकर नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पानी की जरूरत को अलग-अलग तरीके से मापा जाता है। लेकिन प्रति हेक्टेयर फसल की कुल पानी जरूरत देखें तो गन्ना और धान सबसे ज्यादा पानी मांगने वाली प्रमुख फसलों में हैं, जबकि गेहूं की जरूरत इनसे काफी कम है।
फसल की पानी जरूरत मौसम, मिट्टी, तापमान, बारिश और सिंचाई पद्धति के हिसाब से बदलती है। सरकारी तकनीकी दस्तावेजों में सामान्य तौर पर धान के लिए करीब 900-1300 मिमी, गेहूं के लिए 300-400 मिमी और गन्ने के लिए 1500-2400 मिमी पानी की जरूरत बताई गई है। यानी एक ही खेत में गन्ने की पानी जरूरत गेहूं की तुलना में कई गुना हो सकती है।
इसे आसान भाषा में समझें तो 1 मिलीमीटर पानी = 1 हेक्टेयर जमीन पर करीब 10,000 लीटर पानी। इस हिसाब से 1500 मिमी पानी लगभग 1.5 करोड़ लीटर प्रति हेक्टेयर के बराबर बैठता है। हालांकि यह फसल की कुल पानी आवश्यकता का एक तकनीकी अनुमान है; खेत में वास्तविक सिंचाई की मात्रा बारिश और सिंचाई व्यवस्था के कारण अलग हो सकती है।
धान की समस्या सिर्फ उसकी पानी की कुल जरूरत नहीं है। पारंपरिक धान की खेती में खेत में पानी खड़ा रखने और बार-बार सिंचाई करने की जरूरत पड़ती है। उत्तर-पश्चिम भारत की धान-गेहूं प्रणाली में धान के कारण पानी और ऊर्जा की खपत विशेष रूप से अधिक है।
गेहूं की प्रति फसल पानी जरूरत गन्ने और धान से कम है। लेकिन भारत में गेहूं की खेती बहुत बड़े क्षेत्र में होती है और इसकी लगभग 94.6% फसल भूमि 2020 में सिंचित थी। धान की सिंचित हिस्सेदारी करीब 60.9% और गन्ने की 96% थी।
यानी किसी फसल का पानी संकट में योगदान सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि वह प्रति हेक्टेयर कितना पानी लेती है। फसल कितने क्षेत्र में बोई जा रही है, कितनी बार सिंचाई होती है और पानी का स्रोत क्या है-ये भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
पंजाब और हरियाणा की कहानी इस समस्या को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। हरित क्रांति के बाद इन राज्यों में गेहूं और धान का उत्पादन तेजी से बढ़ा। इससे देश के खाद्य भंडार को मजबूती मिली, लेकिन धीरे-धीरे फसल चक्र पानी की उपलब्धता से अलग होता गया।
NITI Aayog के विश्लेषण के अनुसार पंजाब में कुल बोए गए क्षेत्र में धान का हिस्सा 1970 के दशक की शुरुआत में करीब 10.8% था, जो 2017-18 तक 73.3% हो गया। हरियाणा में यह हिस्सा करीब 8% से बढ़कर 39.5% हुआ। यानी जिन इलाकों में प्राकृतिक रूप से पानी की उपलब्धता धान के लिए आदर्श नहीं थी, वहां भी धान बड़े पैमाने पर उगाया जाने लगा।
इसका असर अब भूजल पर दिखाई देता है। CGWB की 2024 रिपोर्ट के अनुसार देश में भूजल दोहन का औसत स्तर 60.47% है, लेकिन पंजाब, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में भूजल दोहन का स्तर 100% से ऊपर है। तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पुडुचेरी और चंडीगढ़ भी 70-90% वाले समूह में हैं।
गन्ना पानी की जरूरत के मामले में सबसे चर्चित फसलों में है। NITI Aayog के एक विश्लेषण के अनुसार गन्ने को क्षेत्र के हिसाब से लगभग 1500 से 3500 मिमी बारिश/पानी की जरूरत हो सकती है। रिपोर्ट ने इसे स्पष्ट रूप से पानी अधिक मांगने वाली फसल बताया है।
समस्या तब और बढ़ती है जब गन्ने की खेती ऐसे इलाकों में होती है जहां पहले से पानी की कमी है। महाराष्ट्र इसका बड़ा उदाहरण है। NITI Aayog ने बताया था कि राज्य की खेती योग्य जमीन में गन्ने का हिस्सा केवल लगभग 4% होने के बावजूद यह सिंचाई के पानी का करीब 70% तक इस्तेमाल कर सकता है। यह आंकड़ा विशेष रूप से राज्य के कुछ जल-संकट वाले क्षेत्रों के संदर्भ में दिया गया था।
इसलिए समस्या केवल 'गन्ना ज्यादा पानी पीता है' नहीं है। असली सवाल है-गन्ना कहां उगाया जा रहा है और उस पानी की कीमत कौन चुका रहा है?
यहां किसान की मजबूरी समझना जरूरी है। किसान सिर्फ पानी देखकर फसल का चुनाव नहीं करता। उसे यह भी देखना होता है कि फसल बिकेगी कहां, कीमत कितनी मिलेगी और भुगतान कब होगा।
धान और गेहूं के मामले में पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में सरकारी खरीद की मजबूत व्यवस्था ने इन फसलों को अपेक्षाकृत सुरक्षित बाजार दिया है। उदाहरण के लिए हरियाणा की सरकारी एजेंसी HAFED 2025-26 में गेहूं और धान की खरीद MSP पर करती रही।
सरकार 22 प्रमुख फसलों के लिए MSP तय करती है, लेकिन MSP घोषित होना और हर किसान की पूरी फसल की सरकारी खरीद होना एक ही बात नहीं है। यही वजह है कि किसान कई बार ऐसी फसल चुनता है जिसमें उसे बाजार और भुगतान का भरोसा ज्यादा दिखाई देता है।
गन्ने के मामले में भी स्थिति अलग है। गन्ने की खरीद के लिए चीनी मिलों का नेटवर्क है और केंद्र सरकार FRP तय करती है। NITI Aayog ने भी माना है कि गन्ने का आश्वस्त बाजार और अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक रिटर्न किसानों को इसकी ओर आकर्षित करता है।
सरकार समस्या को पहचानती है और बदलाव के लिए योजनाएं भी चला रही है। केंद्र का Crop Diversification Programme पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में धान का क्षेत्र घटाकर दाल, तिलहन, मोटे अनाज और दूसरी फसलों की ओर ले जाने की कोशिश कर रहा है। 2026 में कृषि मंत्रालय ने भी बताया कि यह कार्यक्रम 2013-14 से चल रहा है।
हरियाणा में ‘मेरा पानी मेरी विरासत’ जैसी योजना के जरिए किसानों को धान के बजाय कम पानी वाली फसलें अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
लेकिन बदलाव आसान नहीं है। अगर किसान को धान छोड़ने के बदले दूसरी फसल में बाजार, कीमत, खरीद और आय की गारंटी नहीं मिलेगी, तो केवल पानी बचाने की अपील उसके लिए पर्याप्त नहीं होगी।
यही वजह है कि अब सरकार और कृषि विशेषज्ञों के सामने सवाल सिर्फ 'कौन-सी फसल कम पानी पीती है?' नहीं बल्कि 'कम पानी वाली फसल किसान के लिए आर्थिक रूप से सुरक्षित कैसे बने?' है।
नहीं। इसके साथ सिंचाई का तरीका भी बदलना होगा। बाढ़ या पारंपरिक सिंचाई में पानी की काफी मात्रा खेत तक पहुंचने से पहले और बाद में बर्बाद हो सकती है। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों से कई फसलों में पानी की दक्षता बढ़ाई जा सकती है।
हालांकि धान जैसी फसलों में केवल ड्रिप लगाने से पूरी समस्या हल नहीं होगी। फसल का चुनाव, बुवाई का समय, सिंचाई तकनीक और स्थानीय जल उपलब्धता चारों को साथ देखना होगा।
ICAR ने 2026 में बताया कि उसने CGWB और GRACE उपग्रह के आंकड़ों का इस्तेमाल करके उन राज्यों की पहचान की है जहां मौजूदा फसल पैटर्न और भूजल उपलब्धता में बड़ा अंतर है। इनमें पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्य शामिल हैं।
भारत को खाद्य सुरक्षा भी चाहिए और पानी भी बचाना है। इसलिए धान, गेहूं या गन्ने को अचानक बंद करना व्यावहारिक समाधान नहीं है। असल रास्ता 'सही फसल, सही जगह, सही पानी' की ओर जाना है।
जहां भूजल तेजी से गिर रहा है, वहां कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना होगा। जहां किसी फसल के लिए पर्याप्त बारिश या सतही पानी उपलब्ध है, वहां उसका उत्पादन जारी रखा जा सकता है। साथ ही किसानों को वैकल्पिक फसल के लिए सिर्फ बीज या प्रशिक्षण नहीं, बल्कि बाजार, खरीद, भंडारण और बेहतर कीमत भी देनी होगी। क्योंकि अंततः किसान वही फसल उगाएगा जिससे उसका परिवार चलता है।
इसलिए भारत का पानी संकट सिर्फ कृषि तकनीक की समस्या नहीं है। यह फसल, किसान की आय, MSP, सरकारी खरीद, बिजली सब्सिडी, भूजल और खाद्य सुरक्षा इन सभी नीतियों का साझा सवाल है।
और आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा सवाल यही होगा, क्या भारत ऐसी फसलें उगा पाएगा जिनसे देश का पेट भी भरे और जमीन के नीचे का पानी भी बचा रहे?
Updated on:
20 Aug 2026 10:33 am
Published on:
20 Aug 2026 10:33 am
