
Petrol and Diesel Prices in India : क्रूड ऑयल सस्ता लेकिन पेट्रोल और डीजल महंगा क्यों ?
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत घटती है तो आम आदमी को उम्मीद होती है कि पेट्रोल-डीजल भी सस्ता होगा। लेकिन पंप पर पहुंचते ही तस्वीर अलग दिखाई देती है। कच्चे तेल की कीमत और पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमत के बीच सीधा रिश्ता नहीं है।
19 अगस्त 2026 को दिल्ली में इंडियन ऑयल के पंप पर पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर था। वहीं 2026 में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। मार्च में पश्चिम एशिया संकट के दौरान कच्चे तेल की कीमत करीब 70 डॉलर से बढ़कर लगभग 122 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। इसके बावजूद भारत में खुदरा कीमतों को स्थिर रखने के लिए सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी।
तो आखिर कच्चे तेल से लेकर पेट्रोल पंप तक 1 लीटर पेट्रोल की कीमत कैसे बनती है?
सबसे पहले एक भ्रम दूर करना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिस कच्चे तेल की कीमत की बात होती है, वह सीधे पेट्रोल नहीं होता। रिफाइनरी में कच्चे तेल को प्रोसेस करके पेट्रोल, डीजल, एटीएफ, एलपीजी और कई दूसरे पेट्रोलियम उत्पाद बनाए जाते हैं। इसलिए पेट्रोल की कीमत तय करते समय सिर्फ कच्चे तेल की कीमत नहीं, बल्कि रिफाइनिंग लागत, पेट्रोलियम उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय कीमत, डॉलर-रुपया विनिमय दर, परिवहन, भंडारण, डीलर कमीशन और केंद्र-राज्य के टैक्स भी शामिल होते हैं।
यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 10 डॉलर सस्ता होने का मतलब यह नहीं कि भारत में पेट्रोल भी सीधे 10 डॉलर के अनुपात में सस्ता हो जाएगा।
इसे दिल्ली के उदाहरण से समझना आसान होगा। पेट्रोल की अंतिम कीमत मोटे तौर पर इस तरह बनती है…कच्चे तेल की लागत → रिफाइनिंग/प्रोसेसिंग → तेल कंपनी की लागत और मार्जिन → डीलर का कमीशन → केंद्र का उत्पाद शुल्क → राज्य का VAT/सेल्स टैक्स → अंतिम खुदरा कीमत
PPAC के मुताबिक पेट्रोल और डीजल के लिए अलग-अलग कंपनियों के price build-up में यही पूरी श्रृंखला दिखाई जाती है।
PPAC के एक आधिकारिक मूल्य-विवरण में 1 नवंबर 2024 को दिल्ली के पेट्रोल के लिए करों और डीलर कमीशन से पहले की कीमत करीब 72.47 रुपये प्रति लीटर थी, इसके ऊपर 19.90 रुपये का केंद्रीय उत्पाद शुल्क, करीब 3.84 रुपये का औसत डीलर कमीशन और 15.40 रुपये VAT जोड़ा गया था। अंतिम कीमत 111.61 रुपये प्रति लीटर थी। यह 2024 का उदाहरण है, मौजूदा कीमत का बिल नहीं।
यही उदाहरण बताता है कि पंप पर दिखाई देने वाली कीमत में सिर्फ कच्चे तेल की कीमत शामिल नहीं होती।
पेट्रोल और डीजल को अभी GST के दायरे में नहीं रखा गया है। इसलिए इन पर केंद्र का उत्पाद शुल्क और राज्यों का VAT/सेल्स टैक्स लगता है। केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी। लेकिन सरकार ने इसे पंप पर कीमत घटाने के बजाय उस समय तेल कंपनियों को हो रहे नुकसान की भरपाई में इस्तेमाल किया। इसका मतलब यह हुआ कि टैक्स कम हुआ, लेकिन खुदरा कीमत उसी अनुपात में नीचे नहीं आई। यह घटना इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि कच्चे तेल, टैक्स और पंप की कीमत के बीच संबंध कितना जटिल है।
एक ही पेट्रोल, लेकिन अलग-अलग राज्य और अलग कीमत। इसकी बड़ी वजह राज्य सरकारों का VAT है। PPAC के अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में पेट्रोल पर 19.40% VAT है। राजस्थान में 29.04% VAT के साथ 1.50 रुपये प्रति लीटर रोड डेवलपमेंट सेस है। महाराष्ट्र में 25% VAT के साथ 5.12 रुपये प्रति लीटर अतिरिक्त टैक्स है। कर्नाटक में बिक्री कर 29.84% और तेलंगाना में 35.20% VAT दर्ज है।
यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल की मूल लागत समान दिशा में चलने के बावजूद राज्य के टैक्स की वजह से पंप की कीमत अलग हो सकती है।
यही कारण है कि पेट्रोल-डीजल को GST में लाने की चर्चा अक्सर होती है। अगर इन्हें GST में लाया जाता है तो कर ढांचा ज्यादा एकरूप हो सकता है, लेकिन केंद्र और राज्यों के राजस्व पर इसका बड़ा असर पड़ेगा। इसलिए यह सिर्फ उपभोक्ता राहत का सवाल नहीं, बल्कि संघीय वित्त का भी सवाल है।
तेल कंपनियां रोज कच्चा तेल नहीं खरीदतीं : रिफाइनरी का संचालन लंबे समय की खरीद, भंडारण और अनुबंधों पर आधारित होता है। इसलिए आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत गिरने का असर उसी दिन पंप पर आना जरूरी नहीं है।
पेट्रोल की कीमत कच्चे तेल से नहीं, तैयार उत्पाद की कीमत से भी जुड़ी है : अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल और डीजल की अपनी कीमत होती है। इसे उत्पाद कीमत कहा जाता है। भारत में तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय उत्पाद कीमतों और अन्य बाजार स्थितियों को ध्यान में रखकर मूल्य तय करती हैं।
सरकार के मुताबिक पेट्रोल और डीजल की कीमतें बाजार-निर्धारित हैं और तेल विपणन कंपनियां अंतरराष्ट्रीय उत्पाद कीमतों तथा बाजार परिस्थितियों के अनुरूप कीमत तय करने में सक्षम हैं। देशभर में दैनिक मूल्य संशोधन 16 जून 2017 से लागू हुआ था।
डॉलर-रुपये का असर : भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत डॉलर में होती है।
मान लीजिए कच्चा तेल 5% सस्ता हुआ, लेकिन उसी दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो गया। तब भारतीय आयातक के लिए कीमत में कमी काफी हद तक खत्म हो सकती है। इसलिए भारत में पेट्रोल की कीमत को समझने के लिए तेल की कीमत के साथ डॉलर की कीमत भी देखनी पड़ती है।
टैक्स और दूसरे खर्च स्थिर नहीं होते : पेट्रोल की अंतिम कीमत में केंद्र का उत्पाद शुल्क, राज्य का VAT, डीलर कमीशन और दूसरे घटक शामिल होते हैं। इसलिए कच्चे तेल में गिरावट का पूरा फायदा उपभोक्ता तक पहुंचने के लिए इन सभी घटकों का असर देखना पड़ता है।
मार्च 2026 में पश्चिम एशिया संकट के दौरान कच्चे तेल की कीमत करीब 70 डॉलर से बढ़कर लगभग 122 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई। सरकार ने उस समय पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क 10 रुपये प्रति लीटर घटाया, लेकिन खुदरा कीमत बढ़ने नहीं दी। सरकार ने बताया कि उस समय सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति लागत से नीचे कर रही थीं और उन्हें भारी अंडर-रिकवरी हो रही थी।
यानी उस समय सरकार का मॉडल था : कच्चा तेल महंगा → तेल कंपनियों पर दबाव → केंद्र ने टैक्स घटाया → पंप कीमत स्थिर रखी। इसका मतलब यह भी है कि हर बार अंतरराष्ट्रीय तेल कीमत बढ़ने पर उसका पूरा बोझ तुरंत उपभोक्ता पर नहीं डाला जाता।
यह कहना सही नहीं होगा कि पेट्रोल की पूरी कीमत सिर्फ सरकार तय करती है या सिर्फ तेल कंपनियां तय करती हैं। तेल कंपनियों की लागत में कच्चे तेल की खरीद, रिफाइनिंग, परिवहन, भंडारण और वितरण शामिल होते हैं। इसके बाद डीलर का कमीशन भी जुड़ता है।
सरकार की भूमिका मुख्य रूप से कर और नीति के स्तर पर आती है, जबकि बाजार-निर्धारित व्यवस्था में तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों और बाजार परिस्थितियों को ध्यान में रखती हैं।
अगर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक नीचे रहती है, रुपया स्थिर रहता है और अंतरराष्ट्रीय पेट्रोल उत्पाद कीमतों में भी गिरावट आती है, तो भारत में पेट्रोल की कीमत कम होने की गुंजाइश बढ़ती है।
लेकिन अगर केंद्र या राज्य सरकारें टैक्स में बदलाव नहीं करतीं, तो कच्चे तेल में आई पूरी गिरावट पंप तक पहुंचना जरूरी नहीं है।
दूसरी तरफ अगर कच्चा तेल अचानक बहुत महंगा हो जाता है, तो सरकार टैक्स घटाकर या तेल कंपनियों को कीमत समायोजित करने देकर उपभोक्ता पर तत्काल बोझ कम कर सकती है।
इसका जवाब एक लाइन में देना मुश्किल है। पेट्रोल की कीमत में कच्चा तेल सिर्फ पहला हिस्सा है। उसके बाद रिफाइनरी, अंतरराष्ट्रीय पेट्रोल कीमत, डॉलर-रुपया दर, परिवहन, डीलर कमीशन और केंद्र-राज्य के टैक्स जुड़ते जाते हैं।
इसीलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरने के बावजूद पंप पर पेट्रोल उतनी तेजी से सस्ता नहीं होता और भारत में यह सवाल सिर्फ तेल की कीमत का नहीं है। पेट्रोल-डीजल पर लगने वाला टैक्स सरकारों के लिए बड़ा राजस्व स्रोत है, जबकि महंगा ईंधन परिवहन, खेती, माल ढुलाई और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत को प्रभावित करता है।
यानी पेट्रोल की कीमत का असली खेल कुएं से पंप तक नहीं, बल्कि कच्चे तेल से लेकर रिफाइनरी, डॉलर, टैक्स और सरकारी नीतियों तक फैला हुआ है।
Updated on:
20 Aug 2026 11:14 am
Published on:
20 Aug 2026 11:13 am
