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खेत की मिट्टी में भी छिपा है प्लास्टिक! फसल उगाने वाली जमीन बन रही प्रदूषण का नया ठिकाना

Microplastics in farm soil: माइक्रोप्लास्टिक की चिंता अब समुद्र और नदियों से आगे बढ़कर खेतों तक पहुंच गई है। भारतीय रिसर्च में कृषि मिट्टी के नमूनों में प्लास्टिक के बेहद छोटे कण मिले हैं, जिससे मिट्टी के स्वास्थ्य और खाद्य श्रृंखला पर नए सवाल उठ रहे हैं।
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 20, 2026

Microplastics in farm soil

Microplastics in farm soil: भारतीय वैज्ञानिकों की नई चिंता खेतों की मिट्टी तक पहुंचा माइक्रोप्लास्टिक कहीं खतरे में तो नहीं खाद्य श्रृंखला? (AI Creative)

Microplastics in farm soil: हम जिस मिट्टी को अन्न पैदा करने वाली जमीन मानते हैं, उसमें अब ऐसी चीज भी पहुंच रही है, जिसे आंखों से देखना लगभग असंभव है और वो है माइक्रोप्लास्टिक। माइक्रोप्लास्टिक पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जो प्लास्टिक कचरे के टूटने, कृषि में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक सामग्री, प्रदूषित सिंचाई जल और वातावरण से मिट्टी तक पहुंच सकते हैं।

2025 की भारतीय रिसर्च खेतों की मिट्टी तक खींचा ध्यान

अब तक माइक्रोप्लास्टिक की चर्चा समुद्र, नदियों और मछलियों के संदर्भ में ज्यादा होती रही है। लेकिन 2025 की भारतीय रिसर्च ने ध्यान खेतों की मिट्टी की ओर खींचा है। कर्नाटक और गोवा के 15 धान के खेतों से लिए गए नमूनों के अध्ययन में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया। शोधकर्ताओं ने सतह के साथ 10, 20 और 30 सेंटीमीटर की गहराई से भी मिट्टी के नमूने लिए, यानी सवाल केवल जमीन की ऊपरी परत तक सीमित नहीं है।

प्लास्टिक खेत तक पहुंच कैसे रहा है?

कृषि भूमि में माइक्रोप्लास्टिक पहुंचने के कई रास्ते हो सकते हैं। खेतों में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक सामग्री, प्लास्टिक मल्च, सिंचाई का प्रदूषित पानी, आसपास का कचरा और हवा से गिरने वाले कण इसके संभावित स्रोत हैं।

भारत में 2025 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा ने कृषि मिट्टी से संबंधित 73 अध्ययनों के निष्कर्षों को देखा। इसमें सिंचाई, औद्योगिक गतिविधियां, खराब कचरा प्रबंधन और कृषि गतिविधियों को माइक्रोप्लास्टिक के संभावित स्रोतों में शामिल किया गया।

यानी खेत में प्लास्टिक का पहुंचना केवल किसान द्वारा प्लास्टिक इस्तेमाल करने की कहानी नहीं है। शहर का कचरा, नदियों का प्रदूषण और सिंचाई व्यवस्था भी इस समस्या को खेत तक पहुंचा सकती है।

मिट्टी के अंदर जाने के बाद क्या होता है?

यहीं वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है। माइक्रोप्लास्टिक मिट्टी के भौतिक और जैविक गुणों को प्रभावित कर सकता है। इसके कण मिट्टी की संरचना, पानी की आवाजाही और मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्मजीवों के समुदाय के साथ परस्पर क्रिया कर सकते हैं। हालांकि यहां सावधानी जरूरी है।

अभी उपलब्ध शोध से यह कहना जल्दबाजी होगी कि खेत की मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक मिलने का मतलब सीधे इंसानों के स्वास्थ्य पर निश्चित रुप से बुरा प्रभाव पड़ेगा। वैज्ञानिक अभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक, उनके आकार, मात्रा और मिट्टी की परिस्थितियों के अनुसार प्रभाव कितना बदलता है।

2025 के एक अध्ययन में उत्तरी भारत की आठ अलग-अलग भूमि-उपयोग श्रेणियों की मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी, उसके प्रकार और पारिस्थितिक जोखिम का आकलन किया गया। शोध ने यह भी दिखाया कि केवल कणों की संख्या देखकर जोखिम तय नहीं किया जा सकता, प्लास्टिक का प्रकार भी महत्वपूर्ण है।

जंगल, खेत और शहर, हर मिट्टी एक जैसी नहीं

असम की ब्रह्मपुत्र घाटी से जुड़े 2025 के शोध में अलग-अलग भूमि उपयोग वाली मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा में अंतर पाया गया। अध्ययन में अलग-अलग स्थानों पर 5 से 57 कण प्रति किलोग्राम मिट्टी तक की मात्रा दर्ज की गई। खास बात यह है कि कम कण मिलने वाली जमीन भी जरूरी नहीं कि कम जोखिम वाली हो, क्योंकि प्लास्टिक का रासायनिक प्रकार और उसकी विशेषताएं भी जोखिम बदल सकती हैं।

यही कारण है कि वैज्ञानिक अब केवल यह नहीं पूछ रहे कि, 'मिट्टी में कितना प्लास्टिक है?' बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि 'कौन सा प्लास्टिक है, कितनी गहराई में है और मिट्टी के जीवों पर उसका क्या असर पड़ रहा है?'

सबसे बड़ी चिंता बन रही खाद्य श्रृंखला

फसल मिट्टी, पानी और पोषक तत्वों पर निर्भर करती है। इसलिए वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मिट्टी में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक और पौधों के बीच किस तरह की अंतःक्रिया होती हैं और क्या कुछ परिस्थितियों में ये कण पौधों के ऊतकों तक पहुंच सकते हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि, अभी इसे सीधे 'माइक्रोप्लास्टिक से उगाई फसल खाने पर बीमारी होगी' जैसी निश्चित चेतावनी में बदलना फिलहाल सही नहीं होगा। इस क्षेत्र में मानव स्वास्थ्य से जुड़े प्रमाण अभी विकसित हो रहे हैं।

खेतों के लिए नया शोध-अलार्म

इस समस्या की एक और बड़ी चुनौती यह है कि मिट्टी से माइक्रोप्लास्टिक को निकालने के लिए अभी कोई सार्वभौमिक और मानकीकृत उपचार व्यवस्था मौजूद नहीं है। 2025 में केरल के एक प्रदूषित क्षेत्र से संबंधित रिपोर्ट में भी अधिकारियों ने बताया कि मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक के लिए वैश्विक स्तर पर कोई मानकीकृत स्वीकार्य सीमा या स्थापित उपचार पद्धति उपलब्ध नहीं है।

इसीलिए समाधान सिर्फ खेत की मिट्टी साफ करने में नहीं, बल्कि प्लास्टिक को खेत तक पहुंचने से रोकने में ज्यादा प्रभावी हो सकता है। बेहतर कचरा प्रबंधन, सिंचाई जल की गुणवत्ता की निगरानी और कृषि में अनावश्यक प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करना इसका हिस्सा हो सकता है।

कहना होगा कि खेत की मिट्टी को अब सिर्फ उपजाऊपन की कसौटी पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। आने वाले वर्षों में मिट्टी की सेहत का एक नया सवाल यह भी होगा कि, उसके अंदर कितना ऐसा प्लास्टिक है जिसे आंखें देख नहीं सकतीं।