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भारत में शादी के बाद 50% कामकाजी महिलाएं छोड़ रहीं करियर; जानिए इसका कारण, समझें आंकड़ों का सच

महिलाओं के लिए घरेलू जिम्मेदारियां और करियर को एक साथ संभालकर रखना बड़ी चुनौती है। भारत में कामकाजी महिलाएं घर-परिवार की जिम्मेदारी और बच्चों की परवरिश के लिए अक्सर करियर से ब्रेक ले लेती हैं।
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भारत

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Vinay Shakya

Sep 17, 2026

Challenges in women careers

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)

भारत में महिलाओं के करियर पर 30 की उम्र एक बड़ा मोड़ साबित होती है। पढ़ाई और शुरुआती नौकरी तक सब कुछ सामान्य रहता है, लेकिन शादी और मातृत्व के बाद बड़ी संख्या में महिलाएं वर्कफोर्स से बाहर हो जाती हैं। वर्ल्डोमीटर और UN पॉपुलेशन डिवीजन के अनुमान के अनुसार 2026 में भारत की कुल आबादी लगभग 147.6 करोड़ तक पहुंच चुकी है, जिसमें महिलाओं की संख्या करीब 71-72 करोड़ के आसपास है।

50% महिलाएं 30 की उम्र में ले रहीं करियर ब्रेक

अशोका यूनिवर्सिटी के जेनपैक्ट सेंटर फॉर वीमेंस लीडरशिप की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 73 प्रतिशत भारतीय महिलाएं बच्चे को जन्म देने के बाद अपनी नौकरी छोड़ देती हैं। देश की कामकाजी महिलाओं में से 50% बच्चों की देखभाल के लिए 30 साल की उम्र में नौकरी छोड़ देती हैं। मां बनने के बाद सिर्फ 27 प्रतिशत महिलाएं ही करियर में आगे बढ़ पाती हैं और वर्कफोर्स का हिस्सा बनी रहती हैं।

करियर में वापस लौटने वाली महिलाओं में से महज 16 प्रतिशत ही सीनियर लीडरशिप पदों तक पहुंच पाती हैं। यह अध्ययन कॉरपोरेट, मीडिया और डेवलपमेंट सेक्टर की महिलाओं पर आधारित था, न कि किसी हालिया PLFS डेटा पर।

क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के आधिकारिक पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के अनुसार, तस्वीर उतनी निराशाजनक नहीं जितनी पुराने आंकड़े दिखाते हैं। महिला श्रम बल भागीदारी दर (सामान्य स्थिति के आधार पर) 2017-18 के 23.3% से बढ़कर 2023-24 में 41.7% हो गई है। यानी 6 साल में करीब 18 प्रतिशत अंकों का सुधार हुआ। हालांकि विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि इस बढ़त का बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र और असंगठित/अवैतनिक पारिवारिक श्रम में है, जबकि वेतनभोगी नियमित नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी लगभग स्थिर बनी हुई है।

करियर ब्रेक की असल वजह क्या है?

महिलाओं के करियर छोड़ने के पीछे विशेषज्ञ मुख्यत घरेलू जिम्मेदारियां, बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल, दफ्तरों में लचीलेपन की कमी, और ब्रेक के बाद दोबारा हायरिंग में आने वाली बाधाओं को जिम्मेदार मानते हैं। मेट्रो शहरों और छोटे शहरों के बीच भी करियर-ब्रेक के पैटर्न में अंतर देखा जाता रहा है। कुल मिलाकर यह साफ है कि भारत में महिलाओं का करियर-ब्रेक एक वास्तविक और गंभीर मुद्दा है।

महिलाओं के करियर में आने वाली चुनौतियां

घरेलू जिम्मेदारियां: शहरी क्षेत्रों में न्यूक्लियर फैमिली का चलन बहुत बढ़ गया है। ऐसे में बच्चों की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी महिला पर आ जाती है। शादी और बच्चों के बाद आज भी समाज और परिवार यह उम्मीद करते हैं कि पुरुष कमाएगा और महिला घर संभालेगी। पारिवारिक सहयोग न मिलने के कारण महिलाएं चाहकर भी घर से बाहर नहीं निकल पातीं।

करियर गैप बन जाता है कमजोरी: ज्यादातर कंपनियां और रिक्रूटर्स 2 से 5 साल का करियर गैप देखकर यह मान लेते हैं कि महिला की काबिलियत कम हो गई है। इंटरव्यू में महिलाओं से उनके करियर ब्रेक को लेकर असहज करने वाले सवाल पूछे जाते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास टूट जाता है।

असुरक्षित और डेकेयर की महंगी फीस: भरोसेमंद, सुरक्षित और किफायती डेकेयर होम या शिशु गृहों की भारी कमी है। कई मामलों में एक वर्किंग वुमेन की सैलरी का 50% से अधिक हिस्सा आया या डेकेयर पर खर्च हो जाता है। इसको देखते हुए कई महिलाएं नौकरी पर लौटने के बजाय घर पर रहना ही बेहतर समझती हैं।

स्किल गैप: टेक्नोलॉजी आज के दौर में बहुत तेजी से बदल रही है। 3-4 साल के ब्रेक के बाद जब महिलाएं वापस आना चाहती हैं, तो उन्हें लगता है कि उनके पुराने स्किल्स अब आउटडेटेड हो चुके हैं। करियर ब्रेक वाली महिलाओं को नए सिरे से ट्रेन्ड करने के लिए बहुत कम संस्थान या कंपनियां आगे आती हैं।

लंबे वर्किंग आवर्स: करियर ब्रेक के बाद जॉब पर लौट रहीं महिलाओं के लिए सुबह से शाम तक ऑफिस में रहना और उसके बाद घर की जिम्मेदारी संभालना एक थकानभरी लाइफस्टाइल हो जाती है। अधिकांश कंपनियां अब वर्क फ्रॉम ऑफिस को अनिवार्य कर रही हैं, जबकि री-एंट्री करने वाली 55% से अधिक महिलाएं हाइब्रिड या वर्क-फ्रॉम-होम की मांग करती हैं ताकि वे घर और काम में संतुलन बना सकें।