20 सितंबर 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

दुनिया की फसलों का कैलेंडर बदल रहा, 20 दिन पहले पक रहा गेहूं, भारत में कब बदलेगा बुवाई-कटाई का समय?

क्या आपने कभी सोचा है कि जलवायु परिवर्तन सिर्फ मौसम को ही नहीं, बल्कि आपकी खाने की फसल की टाइमिंग को भी बदल सकता है? जानिए कैसे बढ़ती गर्मी फसल चक्र को प्रभावित कर रही है और किसान इस चुनौती का सामना कैसे कर सकते हैं!
4 min read
Google source verification

image

Avaneesh Kumar Mishra

Sep 14, 2026

जलवायु परिवर्तन अब केवल फसलों की पैदावार नहीं बदल रहा, बल्कि उनकी जैविक घड़ी भी बदलने लगा है। यूरोप के कुछ हिस्सों में सर्दियों का गेहूं वर्ष 2000 के मुकाबले करीब 20 दिन पहले पक रहा है। मक्का और रेपसीड जैसी फसलों की कटाई भी कई क्षेत्रों में पहले होने लगी है। यूरोपीय आयोग के आंकड़ों पर आधारित हालिया विश्लेषण बताता है कि बढ़ते तापमान के कारण पौधे जरूरी ‘हीट यूनिट’ तेजी से पूरी कर रहे हैं और उनकी विकास अवधि छोटी हो रही है।

यह बदलाव देखने में फायदेमंद लग सकता है-फसल जल्दी तैयार और खेत जल्दी खाली। लेकिन इसके पीछे बड़ा खतरा छिपा है। फसल जितनी जल्दी पकती है, कई परिस्थितियों में दाना भरने का समय उतना ही कम हो सकता है। इसका सीधा असर वजन, गुणवत्ता और उपज पर पड़ सकता है।

भारत के लिए सवाल इसलिए बड़ा है-क्या आने वाले वर्षों में नवंबर में बोया जाने वाला गेहूं अक्टूबर में बोना पड़ेगा? क्या धान की रोपाई मानसून की नई तारीख के साथ बदल जाएगी?

गर्मी कैसे बदल देती है फसल की ‘घड़ी’?

हर फसल को अपने विकास के अलग-अलग चरण पूरे करने के लिए एक निश्चित तापमान संचय चाहिए। इसे सामान्य भाषा में ‘हीट यूनिट’ या ताप इकाई कहा जा सकता है।

जैसे-जैसे औसत तापमान बढ़ता है, पौधा इन ताप इकाइयों को कम दिनों में हासिल कर सकता है। परिणामस्वरूप अंकुरण से फूल, फूल से दाना और दाने से पकने तक की अवधि छोटी हो सकती है।

यूरोप में यही बदलाव अब आंकड़ों में दिखाई दे रहा है। कुछ क्षेत्रों में सर्दियों का गेहूं दो दशक पहले की तुलना में करीब 20 दिन पहले परिपक्व हो रहा है। 2026 की गर्मी और सूखे ने समस्या को और गंभीर किया; फ्रांस में अगस्त के अंत तक केवल 27 प्रतिशत ग्रेन मक्का अच्छी या बहुत अच्छी स्थिति में था। यानी जल्दी पकना हमेशा ज्यादा उत्पादन का संकेत नहीं है।

भारत में इसका पहला असर गेहूं पर क्यों?

भारत में रबी गेहूं का सबसे संवेदनशील चरण फरवरी-मार्च में आता है, जब दानों का भराव चल रहा होता है। इस समय अचानक तापमान बढ़ जाए तो दाना भरने की अवधि कम हो सकती है।

2025-26 के गेहूं सीजन में फरवरी का असामान्य रूप से ऊंचा तापमान फसल पर गर्मी का दबाव लेकर आया। केंद्र सरकार ने माना कि इससे कुछ क्षेत्रों में गेहूं के दाना भरने की अवधि और उपज प्रभावित हुई। हालांकि जल्दी और समय पर बुवाई, अधिक रकबा और जलवायु-सहनशील किस्मों ने राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान को सीमित करने में मदद की।

यही भविष्य के कृषि कैलेंडर का संकेत है-गर्मी जल्दी आए तो गेहूं को भी उससे पहले अपने महत्वपूर्ण चरण पूरे कराने होंगे।

क्या नवंबर का गेहूं अक्टूबर में जाएगा?

पूरे भारत के लिए अचानक बुवाई की तारीख बदल देना संभव नहीं है। लेकिन उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ क्षेत्रों में पहले बुवाई वाली तकनीक पहले से विकसित की जा रही है।

आईसीएआर की एचडीसीएसडब्ल्यू-18 गेहूं किस्म मध्य अक्टूबर की जल्दी बुवाई के लिए उपयुक्त बताई गई है। इसका उद्देश्य फसल को गर्मी आने से पहले महत्वपूर्ण विकास चरण पूरा करने में मदद करना है।

एचडी-3226 जैसी किस्म के लिए सामान्य अनुशंसित बुवाई 5 से 25 नवंबर है, लेकिन अधिकतम उपज के लिए अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में बुवाई का विकल्प भी बताया गया है।

इससे संकेत मिलता है कि भविष्य में गेहूं का एक ही स्थायी कैलेंडर नहीं, बल्कि क्षेत्र और मौसम के अनुसार बदलने वाला बुवाई विंडो ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।

धान बदलेगा तो गेहूं भी बदलेगा

भारत के गंगा के मैदान में धान और गेहूं का कैलेंडर एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। यदि धान देर से कटेगा तो गेहूं देर से बोया जाएगा। गेहूं देर से बोया गया तो मार्च की गर्मी के समय दाना भरने का चरण फंस सकता है।

बिहार की धान-गेहूं प्रणाली पर किए गए एक मॉडल अध्ययन में स्थानीय मानसून की शुरुआत के अनुसार धान लगाने पर रोपाई और कटाई सामान्य व्यवस्था की तुलना में करीब 20 से 30 दिन पहले हो सकती थी। मॉडल में इससे गेहूं पर ताप तनाव घटने और दोनों फसलों की संभावित उपज में सुधार के संकेत मिले। यानी समाधान सिर्फ गेहूं जल्दी बोना नहीं है। कई क्षेत्रों में पूरी धान-गेहूं श्रृंखला का कैलेंडर आगे खिसकाना पड़ सकता है।

खरीफ की तारीख मानसून तय करेगा, कैलेंडर नहीं

खरीफ फसलों में चुनौती अलग है। धान, मक्का, सोयाबीन और कपास की बुवाई स्थानीय मानसून आने पर निर्भर रहती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में मानसून का आगमन और बारिश का वितरण अधिक अनिश्चित हो सकता है। इसलिए सरकार ने 2025 के खरीफ सीजन में 13 राज्यों के लिए स्थानीय मानसून आगमन का कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पायलट चलाया था। इससे करीब 3.88 करोड़ किसानों को स्थानीय मानसून शुरू होने के पूर्वानुमान भेजे गए, ताकि बुवाई की तारीख बेहतर तय की जा सके।

इससे भविष्य की खेती का मॉडल समझ आता है-‘15 जून को बोओ’ की जगह ‘आपके जिले में बारिश शुरू होने की संभावना के आधार पर इस सप्ताह बोओ।’

भारत का कृषि कैलेंडर कहां बदल सकता है?

फसल/क्षेत्रजलवायु खतरा और संभावित बदलाव
गेहूं–पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपीफरवरी-मार्च की बढ़ती गर्मी से दाना भरने का समय घट सकता है। समाधान के तौर पर जल्दी बुवाई और गर्मी-सहनशील किस्मों का महत्व बढ़ेगा।
धान-गेहूं–बिहार/पूर्वी यूपीधान की देर से कटाई गेहूं को गर्मी में फंसा सकती है। कम अवधि वाले धान और समय पर गेहूं बुवाई की जरूरत बढ़ सकती है।
खरीफ मक्कामानसून में देरी और अनियमित बारिश से बुवाई का समय बदल सकता है। स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के अनुसार बुवाई करनी होगी।
सोयाबीन/कपासबारिश के अनिश्चित वितरण से तय तारीख वाली बुवाई जोखिमपूर्ण हो सकती है। मिट्टी की नमी और बारिश देखकर बुवाई विंडो तय करनी होगी।
फल-बागवानी फसलेंगर्म सर्दियां और तापमान में बदलाव से फूल और फल बनने का समय बदल सकता है। क्षेत्र के अनुसार किस्म और खेती का कैलेंडर बदलना पड़ सकता है।

क्या जल्दी पकने से अनाज की गुणवत्ता भी बदलेगी?

हां, यही सबसे महत्वपूर्ण जोखिमों में है। गेहूं में दाना भरने की अवधि घटने से दाने का आकार और वजन प्रभावित हो सकता है। अत्यधिक तापमान प्रोटीन, स्टार्च और दूसरी गुणवत्ता विशेषताओं पर भी असर डाल सकता है।

भारत में 2025-26 के दौरान फरवरी की गर्मी के साथ पकने के समय कुछ स्थानों पर असमय बारिश और ओलावृष्टि ने भी गुणवत्ता और उत्पादन को प्रभावित किया।

यानी भविष्य में किसान को केवल “कब बोना है” नहीं, बल्कि ऐसी किस्म चुननी होगी जो नई तापमान खिड़की में सही समय पर फूल और दाना बना सके।

बड़ी खबरें

View All

Patrika+

ट्रेंडिंग