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बीकानेर थिएटर फेस्टिवल में तीसरे दिन हुआ इन पांच नाटकों का मंचन, देखें तस्वीरें

नाटकों से राजस्थानी संस्कृति साकार हो उठी।

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Theater Festival

राजस्थानी लोकगीत, संगीत, राजस्थानी मांड, पपेट आदि के साथ जीवन में प्यार व उनके खोने का तनाव, रिटायर होने के बाद जीने के तरीके, दो लोगों के बीच निरर्थक संवाद में छोटे रास्तों के लिए बड़ा रास्ता चुनना, मंच पर कलाकारों के डायलॉग पर ठहाके लगाते दर्शक, कलाकारों की प्रस्तुतियों पर वाहवाही, दूसरे नाटक में जाने के लिए उत्साहित लोग। यह सारा नजारा सोमवार को बीकानेर थिएटर फेस्टिवल के तीसरे दिन पांच नाटकों के मंचन के अवसर का था। इन नाटकों से राजस्थानी संस्कृति साकार हो उठी।

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हंसा गेस्ट हाउस में सोमवार को दोपहर 12 बजे नाटक 'द जू स्टोरी' का मंचन किया गया। यह अमरीकी लेखक एडवर्ड एल्बी का 1959 में लिखा पहला नाटक है। इसमें महानगर में व्यक्ति की गौण होती पहचान के बीच अकेलेपन और वर्गभेद का द्वन्द्व दिखाया गया है। नाटक में दो लोगों में न्यूयॉर्क शहर के सेंट्रल पार्क में मुलाकात के बाद निरर्थक संवाद हो गया। जैरी सेंट्रल पार्क में बैठकर किताबें पढ़ता है, तो पीटर उससे संवाद कर रास्तों के बारे में पूछता है। वह छोटे रास्तों पर जाने के लिए वह बड़ा रास्ता चुनता है। साथ ही चिडि़याघर के पशु-पक्षियों पर संवाद हुआ। इसमें व्यक्ति की संवादहीनता, अमानुषिक प्रवृत्ति को दिखाया गया। नाटक का मंचन मजाहिर सुल्तान व डॉ. हितेन्द्र गोयल ने किया।

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रेलवे ऑडिटोरियम में दोपहर 2:30 बजे दिन की दूसरा नाटक द पोट्रेंट का मंचन किया गया। राजेन्द्र सिंह पायल के निर्देशन में ओ हेनरी की कहानी पर आधारित नाटक में सामाजिक परिस्थितियों को दिखाया गया। मंच पर श्रेया रावत, धर्मेन्द्र भारती, चन्द्रप्रतापसिंह ने अभिनय किया।

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रेलवे ऑडिटोरियम में दोपहर 3.40 बजे दिन का तीसरा नाटक 'जिंदगी रिटायर नहीं होती' का मंचन किया गया। इसमें जीएस चैनी के निर्देशन में कलाकारों ने लोगों को रिटायरमेंट के दौरान जीवन जीने के तरीके बताए। नाटक में जिंदगी को वेटिंग रूम की तरह न देखने की बात कही गई। संदेश दिया कि कोई अगर आकर आपका हाथ धामे, उससे पहले आप आगे बढ़कर उसका हाथ धाम लें। नाटक में नकारात्मक उलझने की बजाय सकारात्मक सोच, खुशमिजाजी से जिंदगी को खूबसूरत बनाने की प्रेरणा दी गई। इसमें संदेश दिया गया जिंदगी के प्रति अपना नजरिया आपको आगे ले जाता है।

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शाम 5:30 बजे रवीन्द्र रंगमंच पर दिन का चौथा नाटक 'कसूमल सपणो' का मंचन किया गया। विलियम शेक्सपियर के मिडनाइट ड्रीम्स में लिखे नाटक को सुदूर राजस्थानी परिवेश, राजस्थानी लोक संस्कृति, राजस्थानी संगीत में ढाला गया। नाटक की सरंचना में विलियम शेक्सपियर का जादू होते हुए भी राजस्थानी संस्कृति सिर चढ़कर बोली। राजस्थानी मांड, पपेट, कॉस्टिंग में खेले गए नाटक की मूलकथा में जीवन से प्यार तथा उसके खोने का तनाव दिखाई दिया। तीस कलाकारों ने मंच पर राजस्थान को उकेर दिया। वर्तमान परिस्थितियों पर कटाक्ष से दर्शक आनंदित हो उठे।

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रात 8 बजे टीएम ऑडिटोरियम में दिन का पांचवा नाटक 'औरंगजेब' का मंचन किया गया। नाटक में ताजमहल का दीदार किया गया। साथ ही गजलों से ऑडिटोरियम में वाहवाही बटोरी। बादशाह के संवाद 'ताजमहल को देखो पत्थरों से लिखी एक गजल जैसी है' ने तालियां बटोरी। नाटक में दारासिकोह से संघर्ष और मुगल सल्तनत के उस दौर को बेबाकी को दर्शकों के सामने रखा गया। नाटक में इतिहास के बहाने वर्तमान के संघर्ष को रेखांकित किया गया। उर्दू में संवादों से दर्शकों को नए तरह का फ्लेवर देखने को मिला।