
हैदराबाद में सोमवार को जलवायु-लोचदार कृषि पर तीन दिवसीय जी-20 तकनीकी कार्यशाला का आयोजन हुआ। इसमें केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और हितधारकों से जलवायु-लोचदार कृषि को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग देने का आग्रह किया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न वैश्विक चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की 2022 की छठी आकलन रिपोर्ट प्रकृति, जीवन और अवसंरचना पर जलवायु परिवर्तन के दूरगामी प्रभावों पर बल देती है, जिसके प्रतिकूल प्रभाव दुनिया भर में तेजी से स्पष्ट होते हैं और सतत विकास में बाधा डालते हैं।

करंदलाजे ने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों के बीच कृषि, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के लिए अतिसंवेदनशील है, इसके प्रभाव पहले से ही जी-20 देश महसूस कर रहे हैं। सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, हीटवेव, ठंड, बेमौसम मौसम, उच्च तीव्रता वाली बारिश, कीट का प्रकोप और अन्य खतरे कृषि को बाधित कर रहे हैं।

करंदलाजे ने कहा कि भारत में कई जलवायु परिवर्तन पहल शुरू की गई हैं, जिनमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा जलवायु परिवर्तन पर नेटवर्क प्रोजेक्ट (एनपीसीसी) और जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) शामिल हैं, जिसमें जलवायु परिवर्तन की बहुआयामी चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार किए गए आठ राष्ट्रीय मिशन शामिल हैं।

करंदलाजे ने कहा कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, एक राष्ट्रीय कृषि आपदा प्रबंधन योजना अपना रहा है, जबकि आईसीएआर ने राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और विभिन्न राज्य विभागों के सहयोग से फसलों, बागवानी और पशुधन क्षेत्र में मौसम की विसंगतियों से निपटने के लिए एमओएएफडब्ल्यू द्वारा संचालित 650 जिलों के लिए कृषि आकस्मिकता योजना (डीएसीपी) तैयार की है।

करंदलाजे ने कहा कि भारत में, 151 अत्यधिक जोखिम वाले जिलों के 446 गांवों में किसानों के खेतों पर जलवायु-लोचदार प्रथाओं का प्रदर्शन किया जा रहा है। ग्राम जलवायु जोखिम प्रबंधन समिति और छोटे कृषि मशीनीकरण के लिए कस्टम हायरिंग सेंटर जैसे ग्राम-स्तरीय संस्थान इन लचीली प्रथाओं को अपनाने में मदद कर रहे हैं। इन प्रौद्योगिकियों को बढ़ाने के लिए कई सरकारी योजनाएं चल रही हैं।