
बनारस की बनारसी साड़ियां भारत की सबसे महंगी साड़ियों में से एक है। बनारसी रेशम की शुरूआत कब और कैसे हुई, इसे लेकर कोई खास जानकारी नहीं है। बनारस में बुनकरी का जिक्र ऋग्वेद में मिलता है। इसमें कपास, रेशम और ब्रोकेड जैसे अलग-अलग तरह के कपड़ों पर बुनकरी किए जाने का जिक्र है। बुनकरी को ऋग्वेद में "हिरयान" के नाम से जाना जाता था।

बुनकरी ही बनारसी साड़ियों की पहचान बनारसी साड़ी की खासियत इन साड़ियों पर की गई बुनकरी है। ये देखने में सोने के धागे की तरह लगता है। असल में ये एक तरह की बुनाई होती है। इन बुनाई में जरी के धागे का इस्तेमाल किया जाता है। जरी प्यूर सोने से बना एक खास तरह का धागा है। अब बनारसी साड़ियों में सोने और चांदी की जगह कम होती जा रही है।

बनारस की साड़ियों में होने वाली बुनाई को किंकहाब या कमख्वाब के नाम से भी जाना जाता है। इन बुनाइयों में ज्यादातर सोने या चांदी के धागे सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाते हैं। कुछ में अलग-अलग रेशम के धागों में सोने या चांदी के तार बुने लगे होते हैं। कुछ में मलमल के कपड़ों पर सोने के बॉर्डर लगे होते हैं। काशी के कौटिल्य और पतंजलि के लेखन काशी की बुनाई को "कसिका वस्त्र" या "कसियानी" के नाम से जाना जाता था।

बनारसी साड़ी को बनाने में लगती है बुनकरों की टीम बनारसी साड़ी की बुनाई पूरी करने में लगभग 15 से 30 दिन का समय लगता है। हालांकि, यह डिजाइन और पैटर्न पर भी निर्भर करता है। एक बनारसी साड़ी को बनाने में आमतौर पर 3 बुनकरों की जरूरत होती है। एक साड़ी बुनता है, दूसरी बंडल बनाता है, और तीसरा डिजाइनिंग का काम करता है। एक बनारसी साड़ी में लगभग 5600 धागे के तार होते हैं। सभी 45 इंच चौड़े होते हैं।