
महाभारत के युद्ध के समय जब पितामह भीष्म ने पांडवों का नाश करने की बात कही तो श्रीकृष्ण द्रोपदी को लेकर भीष्म पितामह के शिविर में पहुंचे और उन्हें प्रणाम कर आशीर्वाद लेने को कहा। भीष्म ने उन्हें अखंड सौभाग्यवती भव’ का आशीर्वाद दे दिया। श्रीकृष्ण बोले, ‘तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है। अगर तुम प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य आदि को प्रणाम करती होती तो इस युद्ध की नौबत ही नहीं आती।’

प्रणाम प्राय: शीश नवाकर किया जाता है। हनुमानजी कोई बड़ा कार्य करने के लिए तत्पर होते थे, तो दोनों हाथ जोडक़र तथा शीश नवाकर भगवान राम को प्रणाम करते थे। यह भगवान के प्रति उनकी विनम्रता थी। हनुमान की यह मुद्रा आज जनमानस को भक्तिभाव से भर देती है। गौतम स्वामी ने भगवान महावीर से पूछा- भगवन! प्रणाम से क्या लाभ है? प्रत्युत्तर में भगवान महावीर ने कहा- ‘प्रणाम शीतलता है। प्रणाम करने वाला बाहर से भीतर तक शीतल रहता है। कोई उसे कभी उग्र नहीं बना सकता। सचमुच वह विनम्रता से होता है।’