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ISRO को है इस बात की उम्मीद— दक्षिण ध्रुव पर ठंड का कहर झेलने के बाद भी काम कर सकता है लैंडर विक्रम

लैंडर विक्रम माइनस 200 डिग्री तापमान का झेलने के हिसाब ने तैयार नहीं किया गया है, लेकिन इसका उपकरण धूप निकलने के बाद फिर से सक्रिय हो सकता है।

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नई दिल्‍ली। एक दिन बाद चांद पूरी तरह से घनघोर अंधेरे के आगोश में समा जाएगा। इसी के साथ चांद का तापमान माइनस 200 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाएगा। इसी से अंदाजा लगाया सकता है कि लैंडर विक्रम पर चांद 36 घंटे बाद कितना कहर बरपा रहा होगा। इसलिए वैज्ञानिकों के बीच गहन चिंता का विषय यह है कि क्‍या लैंडर विक्रम चांद के इस कहर को झेल पाएगा?

इसरो और नासा के वैज्ञानिकों के मुताबिक खास बात ये है कि लैंडर को अभी तक कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। यानी इसमें कोई भी टूट-फूट नहीं हुई है। लेकिन माइनस 200 डिग्री सेल्सियस तापमान को झेलना किसी आश्‍चर्य से कम नहीं होगा।
ऐसा इसलिए कि लैंडर विक्रम और रोवर जिस तकनीक और उपकरणों को मिलाकर बना है उसकी गुणवत्‍ता चांद के इस ठंढ को झेलने के काबिल नहीं है।

माइनस 200 डिग्री का कहर

बता दें कि चांद की सतह पर ठंड बेहद खतरनाक होती है। खासकर साउथ पोल में तो तापमान माइनस 200 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। लैंडर विक्रम ने भी साउथ पोल में ही लैंड किया है। चंद्रमा का ऐसा इलाका जहां अब तक कोई देश नहीं पहुंचा है।

दूसरी तरफ इसरो और नासा अब भी लैंडर विक्रम से संपर्क करने के लिए अंतिम जद्दोजहद में जुटा है। इसरो कर्नाटक के एक गांव बयालालु से 32 मीटर के एंटीना का इस्तेमाल कर रहा है। इसका स्पेस नेटवर्क सेंटर बेंगलुरु में है।
इसरो कोशिश कर रहा है कि ऑर्बिटर के जरिए विक्रम से संपर्क किया जा सके। वहीं नासा एलआरओ के साथ दुनिया भर में फैले अपने सभी तीनों अंतरिक्ष स्‍टेशन से संपर्क का प्रयास कर रहा है।

इसरो के पास सिर्फ डेढ़ दिन शेष हैं

इसरो के वैज्ञानिकों के पास सिर्फ 10 दिनों का समय और बचा है। 21 सितंबर तक ही वे लैंडर विक्रम से संपर्क साधने की कोशिश कर सकते हैं। इसके बाद लूनर नाइट की शुरुआत हो जाएगी। जहां हालात बिल्कुल बदल जाएंगे। 14 दिन तक ही विक्रम को सूरज की रोशनी मिलेगी।

बता दें कि लैंडर और रोवर को भी सिर्फ 14 दिनों तक काम करना था। यानि 36 घंटे बाद इसरो चाहते हुए भी लैंडर से संपर्क नहीं साध पाएगा।

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