
Chaudhary Mahendra Singh Tikait death anniversary : वो किसान नेता जिसके तेवर से कांपती थी हुकूमत
Chaudhary Mahendra Singh Tikait death anniversary सन 1990 का वो दौर जिसमें देश की राजनीति करवट ले रही थी। इसी दौरान किसान राजनीति धारदार होती जा रही थी। किसान राजनीति की कमान चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के हाथ में थी। वहीं महेंद्र सिंह टिकैत जो किसान राजनीति के चौधरी माने जाते थे। उनकी चौखट पर 90 के दशक के बाद जो भी सरकारें केंद्र या प्रदेश में आई मत्था टेकने सिसौली जरूर पहुंचीं। करमूखेड़ी बिजली घर से शुरू हुए एक छोटे से आंदोलन ने चौधरी महेंद सिंह टिकैत को किसानों का ऐसा मसीहा बना दिया। जिसने अपनी लाठी और हुक्के के बल पर सरकारों को हिलाकर रख दिया। 90 के दशक में केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। प्रधानमंत्री थे पीवी नरसिम्हा राव,हर्षद मेहता कांड की गूंज पूरे देश में थी। देश में पहली बार शेयर बाजार में पांच हजार करोड़ रुपये का घोटाला हुआ था। किसानों की समस्याओं को लेकर बाबा टिकैत प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव से मिलने दिल्ली पहुंचे। प्रधानमंत्री से मिलते ही बाबा महेंद्र सिंह टिकैत ने उनसे पूछ ही लिया कि क्या आपको एक करोड़ रुपया मिला है? कोई प्रधानमंत्री से ऐसा सवाल कैसे पूछ सकता है। प्रधानमंत्री राव साहब ने चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत से कहा,'चौधरी साहब आप ऐसा सोच रहे हैं?
चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत प्रधानमंत्री से मुलायम सिंह सरकार द्वारा लखनऊ में किसानों पर ज्यादती के मामले में मिलने गए थे। उन्होंने कहा कि हर्षद मेहता पांच हजार करोड़ का घपला करे हुए है। जिसमें कई मंत्री शामिल हैं। सरकार उनसे वसूली नहीं कर पाई। लेकिन किसानों को दो सौ रुपए वसूली के लिए जेल भेज रही है। कुछ ऐसा ही अंदाज था महेंद्र सिंह टिकैत का देश भर में।
किसान राजनीति के चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत सबसे बड़े चौधरी थे। आजादी के पहले कई ऐसे किसान आंदोलन हुए। जिनमें देश के दिग्गज नेताओं के साथ ही महात्मा गांधी तक शामिल हुए। आजादी मिली तो देश भर में हर राज्य में किसान हितों के लिए किसान संगठन बने। इन संगठनों में किसानों के कई बड़े नेता बने। लेकिन समय बदला तो नेता भी बदलते चले गए। लेकिन चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत उन किसान नेताओं से अलहदा ही रहे।
यहीं कारण है कि चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने सबसे बड़े किसान नेता के तौर पर देश के किसानों के बीच अपनी जगह बनाई। ये वो नेता थे जिनके दिल में जो आता था कह दिया करते थे। उनको इससे मतलब नहीं था किसी को क्या फर्क पड़ता है। 1988 में मेरठ कमिश्नरी धरने ने प्रदेश से लेकर देश की केंद्र सरकार को किसानों के सामने झुकने के लिए मजबूर कर दिया था। आज किसान नेता इस दुनिया में नहीं हैै लेकिन उनकी कमी आज भी किसानों को खल रही है। किसान अपने को नेतृत्वविहीन मान रहा है।
Published on:
15 May 2022 02:17 pm
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