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बांग्लादेश को नए मुकाम पर लेकर जा सकती हैं शेख हसीना

यह तो सभी जानते हैं कि शेख हसीना या अन्य कोई भी किसी देश पर हमेशा शासन नहीं कर सकता। विपक्ष का मकसद राजनीतिक उलटफेर करना होता है पर हसीना विपक्ष को आसानी से हावी नहीं होने देंगी।
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बांग्लादेश को नए मुकाम पर लेकर जा सकती हैं शेख हसीना

बांग्लादेश के क्या अच्छे दिन आ गए हैं। देश की नवनियुक्त प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश जिस तरह से विकास कर रहा है और विचारधारा रखता है वह दुनिया के दूसरे देशों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। पिछले साल बांग्लादेश की आर्थिक विकास दर आठ फीसदी के करीब थी जो पड़ोसी मुल्क भारत की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है। नोबल पुरस्कार विजेता और अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन इसे मानव का विकास मानते हुए कहते हैं कि ये और अच्छा तब होगा जब हर व्यक्ति की आय भी बढ़ेगी।

बांग्लादेश दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहां धर्मनिरपेक्षता उसकी राष्ट्रीय पहचान है। ऐसे में कुछ अमीर और बड़े मुल्कों को इससे शर्म आनी चाहिए और इससे सबक लेते हुए उनसे कुछ सीखना होगा। भीड़भाड़ और अत्यधिक जनसंख्या वाले इस देश में करीब सात लाख लोग तो म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थी हैं। बांग्लादेश में शेख हसीना की जीत चौंकाने वाली है। इनकी पार्टी आवामी लीग ने 298 संसदीय क्षेत्रों में दस को छोडकऱ सभी में जीत दर्ज की जबकि हसीना 2 लाख से अधिक मतों से विजयी हुईं।

इसमें भी कोई दो राय नहीं रही कि इनकी पार्टी ने चुनाव का बेहतर ढंग से प्रबंधन किया। दूसरा फायदा इन्हें ये मिला की इनके विपक्षी दल के अधिकतर नेता या तो जेल में है या देश निकाला हैं। विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता खलिदा जिया जेल में है जबकि उनके बेटे व परिवार ब्रिटेन में रह रहे हैं, अगर वे बांग्लादेश आते हैं तो उन्हें आजीवन जेल तय है। शेख हसीना की विचारधारा ने दिखा दिया है कि बंगाली और इस्लाम दोनों को साथ लेकर चलना चाहती है। क्योंकि उनके शब्दकोश में ‘मुस्लिम’ शब्द है ही नहीं।

भारत को भी अच्छे रिश्ते की है उम्मीद

बांग्लादेश की राजनीति में राजनीतिक हिंसा आम है और भारत के पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसा होता आ रहा है। इसके अलावा देश में कई ऐसे राज्य हैं जहां चुनावों के दौरान खून बहना आम है। शेख हसीना का कार्यकाल भारत के लिए बेहतर है और आने वाले समय में दोनों देशों के बीच होने वाली द्धीपक्षीय वार्ता का सार्थक नतीजा देखने को मिलेगा लेकिन इसे पूरी तरह संतुलित मान लेना ठीक नहीं होगा क्योंकि राजनीतिक उलटफेर स्थिति को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। वर्ष 2002 में खालिदा जिया का कार्यकाल भारत के लिए अच्छा नहीं था। ये वो दौर था जब बांग्लादेश कट्टरपंथ की ओर बढ़ रहा था और पाकिस्तान की मदद से पड़ोसी मुल्कों में आंतकवाद फैलाने का गढ़ बन गया था। शेख हसीना को अगले पांच साल के बारे में सोचना होगा। फिलहाल वे पूरी तरह खंडित हो चुकी देश की संस्थाओं के पुर्ननिर्माण और प्रशासनिक सुधार में लगी हैं जिससे बांग्लादेश का भविष्य तय होगा।

मिहिर शर्मा,बिजनेस व राष्ट्रीय मामलों के जानकार, ब्लूमर्ब, वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत