
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बिहार की राजधानी पटना में 23 जून को विपक्षी दलों की एक बैठक हुई। इस बैठक में ज्यादा कुछ तो नहीं हुआ। बस इतना ही तय किया गया कि जुलाई में अगली बैठक शिमला में होगी। लेकिन जिस महागठबंधन के दम पर विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी को हराने का सपना देख रही है। वह गठबंधन बनने से पहले ही बिखरता हुआ नजर आ रहा है। इसके पीछे खुद विपक्षी दलों का हाथ है। विपक्ष ने अपनी बैठक में खुद उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक 4 प्रमुख विपक्षी दलों को शामिल नहीं किया।
किस राज्य से किसे नहीं किया गया शामिल
विपक्षी दलों ने लोकसभा के मद्देनजर महागठबंधन बनाने में जिन पार्टियों को शामिल नहीं किया है। उनमें उत्तर प्रदेश से बहुजन समाज पार्टी, उड़ीसा से बीजू जनता दल, आंध्र प्रदेश से युवाजना श्रामिका रैतु कांग्रेस पार्टी (YSR कांग्रेस) और तेलंगाना से भारत राष्ट्र समिति है। इनमें से बसपा को छोड़ सभी पार्टियां अपने अपने राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार चला रही है। बसपा भले पिछले 11 साल से UP की सत्ता से बाहर हो लेकिन वह देश की प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों में से एक है और उसका देश के दलित वोटरों में अच्छा खासा प्रभाव है। 80 सीटों वाले UP में बसपा वोट शेयर के लिहाज से बीते लोकसभा चुनाव में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी रही है।
भाजपा से करीब होना बना कारण
राजनीति के जानकार मानते है कि इन चारों दलों को महागठबंधन से दूर रखने का कारण विपक्ष इन पार्टियों की भाजपा से नजदीकी को मानता है। इसके पीछे कारण है कि भले ही ये दल तटस्थ दिखते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर भाजपा के साथ जाते है। इन दलों की वजह से भाजपा को कई अहम विधेयकों को पारित कराने में मदद मिल जाती है।
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इन चारों के विपक्ष में न जाने पर भाजपा को राहत
अगर हम राज्य के हिसाब से देखे तो तेलंगाना में केसीआर की पार्टी ने 2019 में 17 में से 9 सीटें जीती थीं। 4 भाजपा के हाथ आई थीं और 3 पर कांग्रेस को जीत मिली थी। इस तरह तेलंगाना की सबसे बड़ी पार्टी बीआरएस है और अब यदि कांग्रेस उसके साथ नहीं आती है तो फिर स्वतंत्र रूप से चुनाव के बाद केसीआर किसी भी पाले में जा सकते हैं। यही स्थिति आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और ओडिशा में नवीन पटनायक की है। दोनों ही नेता अपने राज्यों में पूर्ण बहुमत की सरकार चलाते हैं और जरूरत पड़ने पर भाजपा के साथ भी जाते रहे हैं।
भाजपा और इनके बीच एक अनकहा करार रहा है कि वे अपने राज्यों में खुलकर सरकार चलाएं और केंद्र में भाजपा से बनाकर भी रखें। वहीं, मायावती भी भाजपा सरकार के खिलाफ कभी खुलकर बयान नहीं देती और अपने भाषणों में अक्सर सपा और कांग्रेस पर ही हमालावर रहती हैं।
Published on:
27 Jun 2023 03:48 pm
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