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विपक्षी एकता के लिए 2019 में ‘मोरल बूस्‍टर डोज’ साबित होगा कैराना का परिणाम

कैराना लोकसभा सीट पर सपा-आरएलडी प्रत्‍याशी की जीत विपक्षी एकता के लिहाज से बड़ी जीत है।

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Dhirendra Kumar Mishra

May 31, 2018

tabassum

विपक्षी एकता के लिए 2019 में 'मोरल बूस्‍टर डोज' साबित होगा कैराना का परिणाम

नई दिल्‍ली। देश भर में 10 विधानसभा और 4 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए हैं। विधानसभा में नौ सीटों पर विरोधी दल जीत के करीब हैं। वहीं चाल लोकसभा में पालघर सीट भाजपा को जीत मिली है। यही कारण है कि इस उप चुनाव को 2019 लोकसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल माना जा रहा है। लेकिन चार लोकसभा सीटों में से एक कैराना सीट विपक्षी एका के लिए मोरल बूस्‍टर डोल साबित हो सकता है। ऐसा इसलिए कि इस सीट पर एंटी मोदी ब्रिगेड के असर का ही परिणाम है कि सपा-आरएलडी प्रत्‍याशी तबस्‍सुम हसन की जीत तय है। यह भाजपा के लिए इस बात का संकेत है कि 2019 में विरोधी दल मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो उसके लिए दोबारा से सत्‍ता में वापस आना मुश्किल भरा हो सकता है।

2019 में नहीं दिखेगा असर
हालांकि भाजपा के रणनीतिकार कैराना उपचुनाव परिणाम को सपा-आरएलडी समेत सभी विपक्षी दलों के लिए एक नैतिक विजय मानते हैं। भाजपा के रणनीतिकारों का कहना है कि इसका असर लोकसभा चुनाव में नहीं दिखेगा। इसके पीछे उनका तर्क है कि किसी एक सीट पर जिस रणनीति के तहत तबस्‍सुम हसन को कैराना सीट पर जीत मिली है वैसा देश भर में होना नामुमकिन है। क्‍योंकि देश भर में सभी क्षेत्रीय दलों के अपने अपने हित और अलग समीकरण हैं। हर जगह कैराना की तरह विपक्षी दलों में एका को लेकर सहमति बन पाना मुमकिन नहीं है।

अजीत सिंह को जीवनदान
कैराना लोकसभा उपचुनाव में सपा-आरएलडी प्रत्‍याशी की जीत विपक्ष के भीतर बार्गेनिंग पावर को तय करेगा। ऐसा इसलिए कि तबस्‍सुम को कांग्रेस, बसपा, आप और अन्‍य दलों का समर्थन भी हासिल था। इस जीत से लोकसभा के भीतर चौधरी अजीत सिंह की पार्टी आरएलडी का खाता खुल जाएगा। इतना ही अगले साल की बड़ी लड़ाई के लिए चौधरी अजीत सिंह का बार्गेनिंग पावर भी बढ़ जाएगा। ऐसा इसलिए कि ये जीत भले ही विपक्षी एका की हो पर पश्चिमी यूपी के जाट बहुल इलाकों में चौधरी अजीत सिंह को फिर से एक बार जीवनदान मिल गया है। आपको बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त चौधरी अजीत सिंह की पार्टी आरएलडी का खाता तक नहीं खुल पाया था। यहां तक कि चौधरी अजीत सिंह बागपत की अपनी परंपरागत सीट भी हार गए थे।

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