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चुनाव में डमी उम्मीदवार की क्या होती है भूमिका, इसलिए उतरते हैं मैदान में

साध्वी प्रज्ञा ने भोपाल सीट से किया नामांकन भाजपा ने भोपाल सीट से आलोक संजर को बनाया डमी उम्मीदवार 29 अप्रैल को भोपाल में होने हैं लोकसभा चुनाव

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चुनाव में डमी उम्मीदवार की ये होती है भूमिका, इसलिए उतरते हैं मैदान में

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हैं। अभी तक लोकसभा चुनाव के लिए तीन चरणों के मतदान संपन्न हो चुके हैं। चौथे चरण में 9 राज्यों की 71 लोकसभा सीटों पर 29 अप्रैल को मतदान होना है। इन 9 राज्यों में सबसे अहम राज्य है मध्य प्रदेश। यहां के भोपाल लोकसभा सीट से बीजेपी ने कांग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह के खिलाफ साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को उतारा है।

साध्वी ने भोपाल सीट के लिए बीते मंगलवार को नामांकन दाखिल कर दिया है। लेकिन इसके अलावा भोपाल सीट से भाजपा के मौजूदा सांसद आलोक संजर ने भी पार्टी के डमी उम्मीदवार के रूप में मंगलवार को नामांकन-पत्र दाख़िल किया। अब सावाल यह उठता है कि भाजपा को भोपाल सीट से डमी उम्मीदवार की जरूरत क्यों पड़ी? ये डमी प्रत्याशी क्या होते हैं और इनकी चुनाव में क्या भूमिका होती है। आइए इनके बारे में जानते हैं...

डमी उम्मीदवार और उनकी भूमिका-

वैसे तो डमी का मतलब होता है किसी भी सामान या इंसान की तरह हूबहू दिखने वाली दूसरी चीज। लेकिन चुनाव में इसका दूसरा ही मतलब है। राजनीति में देखा जाए तो सियासी पार्टियां किसी भी सीट पर अपने घोषित उम्मीदवारों के साथ उसी सीट पर एक अन्य प्रत्याशी को विकल्प के तौर पर मैदान में उतारती हैं। इसके पीछे की वजह आधिकारिक उम्मीदवार का नामांकन किसी तकनीकी या कानूनी वजहों से रद्द होना है। ऐसी स्थिति में पार्टी के पास विकल्प के तौर पर एक अन्य उम्मीदवार मौजूद होता है जो चुनाव लड़ता है।

उदाहरण-

उदाहरण के तौर पर भोपाल लोकसभा सीट पर भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को आधिकारिक रूप से उम्मीदवार बनाया है। लेकिन उनके अलावा इसी सीट से मौजूदा सांसद आलोक संजर ने भी पार्टी के डमी उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया है। दरअसल, चुनाव प्रचार के दौरान साध्वी प्रज्ञा ने अब तक कई विवादित बयान दिए हैं। इन बयानों पर सख्ती दिखाते हुए चुनाव आयोग ने साध्वी को नोटिस भी जारी किया है। नोटिस को देखते हुए भाजपा ने आलोक संजर को वहां से डमी उम्मीदवार के तौर पर उतारा है। यदि किसी वजह से प्रज्ञा ठाकुर चुनाव नहीं लड़ती तो उनकी जगह पार्टी के लिए भोपाल सीट से आलोक संजर प्रत्याशी होंगे।

निर्दलिया या डमी प्रत्याशी

लेकिन डमी उम्मीदवार को लेकर एक और बात भी सामने आती है। डमी उम्मीदवार को निर्दलिय प्रत्याशी भी कहा जाता है। राजनीतिक पार्टियां इनका उपयोग आर्थिक संसाधन जुटाने के रूप में करती हैं। दरअसल, पहले के मुकाबले अब निर्वाचन आयोग चुनावों को लेकर काफी सख्त हो चुका है। चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों के लिए चुनाव में प्रचार-प्रसार पर खर्च करने की एक राशि निर्धारित कर दी है। लेकिन निर्धारित चुनावी राशि प्रत्याशियों के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के सामान है। इसलिए आमतौर पर प्रत्याशी अपने अति विश्वासपात्र को निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव में खड़ा करते हैं। उनके नाम से संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं। इसमें दलीय प्रत्याशी डमी उम्मीदवार की मदद से अपने लिए वाहन, कार्यकर्ताओं का भोजन, डीजल व पेट्रोल के वाउचर और टेंट की व्यवस्था करते हैं। इसमें कोई कानूनी अड़चन नहीं है।

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