
लोकसभा चुनाव: बिहार के 2 दलित नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर, रामविलास की 'विरासत' का भविष्य भी होगा तय
नई दिल्ली।लोकसभा चुनाव के पहले चरण में बिहार की दलित राजनीति में दखल रखने वाले दो बडे नेताओं का भाग्य भी 11 अप्रैल को मतपेटियों में बंद हो जाएगा। इन दलित नेताओं में से एक जमुई से रामविलास पासवान के बेटे चिराग तो दूसरा गया से हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के सुप्रीमो जीतन राम मांझी हैैं। इस बार दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर है। हालांकि दोनों नेता एक ही सीट पर एक-दूसरे से नहीं टकरा रहे हैं लेकिन उनका मुकाबला अपने-अपने नजदीकी प्रत्याशियों से सीधा होने के कारण जीत-हार का मामला पेंचीदा बना हुआ है।
70 लाख से ज्यादा मतदाता डालेंगे वोट
बता दें कि पहले चरण के चुनाव में बिहार में गया, जमुई, नवादा और औरंगाबाद लोकसभा की सीटों पर 11 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। इन चारों सीटों पर 70 लाख से ज्यादा मतदाता गुरुवार को मतदान करेंगे। वोटिंग के साथ ही उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला भी मतपेटियों में सील हो जाएगा।
चुनाव से तय होगा लोजपा का उत्तराधिकारी
दरअसल, केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान को बिहार में दलितों का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता है। इस बार वो खुद लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं लेकिन उनकी विरासत को संभालने के लिए उनके बेटे चिराग पासवान जमुई से चुनावी मैदान में हैं। यानी चिराग की जीत-हार से लोजपा की विरासत का भविष्य भी तय होगा।
चिराग का भूदेव से है सीधा मुकाबला
लोजपा नेता और रामविलास पासवान के बेटे चिराग का जमुई सीट पर इस बार सीधा मुकालबा आरएलएसपी के प्रदेश अध्यक्ष भूदेव चौधरी से है। 2014 के चुनाव में चिराग पासवान का मुकाबला राजद के सुधांशु शेखर और जेडीयू के उदयनारायण चौधरी से था। पांच साल पहले त्रिकोणीय मुकाबले में चिराग की जीत हुई थी। चिराग पासवान को 2,85,354 मत तो सुधांशु को 1,99,407 और जेडीयू को 1,98,599 मत मिले थे। इस बार उदय नारायण चौधरी मैदान में नहीं हैं। चौधरी का चुनावी मैदान में इस बार न होना किसके लिए मददगार साबित होगा यह देखना दिलचस्प होगा। इतना जरूर है कि जमुई में पीएम मोदी की रैली से चिराग की जीत मुश्किल नहीं दिख रही है।
नवादा सीट पर लोजपा की अग्निपरीक्षा
नवादा सीट पर लोजपा के चंदन कुमार का मुकाबला आरजेडी की विभा देवी से है। यह सीट केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के बेगूसराय जाने के बाद लोजपा को भाजपा ने दी है। आरजेडी की ओर से पिछले चुनाव में राजबल्लभ यादव मैदान में थे। बलात्कार मामले में सजा होने के बाद इस बार उनकी पत्नी को आरजेडी ने मैदान में उतारा है। यहां के नतीजे जातीय समीकरण और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से प्रभावित होने की उम्मीद है। यही वजह है कि लोजपा के लिए यह सीट नाक का विषय बना हुआ है।
मांझी के पक्ष में राहुल कर चुके हैं प्रचार
इसी तरह गया सीट से जीतनराम मांझी का मुकाबला जेडीयू के विजय मांझी से है। 2014 में जीतनराम मांझी इस सीट से जेडीयू के टिकट पर मैदान में उतरे थे और 1,31,828 मत पाकर तीसरे स्थान पर रहे थे। भाजपा के हरि मांझी को सबसे अधिक 3,26,230 मत मिला था। आरजेडी के रामजी मांझी 2,10,726 मत पाकर दूसरे स्थान पर रहे थे। यही कारण है कि इस बार भी जीतन राम मांझी के लिए यहां से जीत हासिल करना आसान नहीं है। लेकिन राहुल गांधी की सभा का असर हुआ तो उनकी सियासी तकदीर ऐन मौके पर बदल सकती है।
उपेंद्र प्रसाद को है भीतरघात का डर
औरंगाबाद में भाजपा के सुनील सिंह का सीधा मुकाबला हम के उपेंद्र प्रसाद से है। हम ने यह सीट कांग्रेस को नाराज कर हासिल की है। कांग्रेस इस सीट पर अपना दावा अंतिम समय तक करती रही। कांग्रेस की परंपरागत सीट औरंगाबाद पर निखिल कुमार के नाराज समर्थक उपेंद्र प्रसाद के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।
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Updated on:
09 Apr 2019 01:51 pm
Published on:
09 Apr 2019 01:20 pm
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