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जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने विधि आयोग को भेजी UCC पर अपनी आपत्ति

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर अपनी आपत्तियां भारतीय विधि आयोग को भेजी हैं। जमीयत के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि समान नागरिक संहिता पर फिर से बहस शुरू करना राजनीतिक साजिश है।  

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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरह, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर अपनी आपत्तियां भारतीय विधि आयोग को भेजी हैं। जमीयत के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि समान नागरिक संहिता पर फिर से बहस शुरू करना राजनीतिक साजिश है। उनका कहना है कि हम पहले से ही मानते हैं कि हम 1300 वर्षों से इस देश में स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करते आ रहे हैं, भले ही तमाम सरकारें आईं और गईं, लेकिन भारतीय अपने धर्म पर जीते और मरते रहे हैं।

हम कानून के दायरे में रहकर अपने धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि समान नागरिक संहिता पर जोर देना संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि सवाल मुसलमानों के पर्सनल लॉ का नहीं है, बल्कि देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान को यथावत बनाए रखने का है।

कयामत तक बदला नहीं जा सकता पर्सनल लॉ

हमारा पर्सनल लॉ कुरान और सुन्नत पर आधारित है, जिसमें कयामत के दिन तक कोई संशोधन नहीं किया जाना चाहिए। मौलाना अरशद मदनी कहते हैं कि समान नागरिक संहिता शुरू से ही एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। हमारा देश सदियों से विविधता में एकता का प्रतीक रहा है, जिसमें विभिन्न धार्मिक और सामाजिक वर्गों और जनजातियों के लोग अपने धर्म की शिक्षाओं का पालन करके शांति और एकता के साथ रहते आए हैं।

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यह एक राजनीतिक साजिश है

जमीयत अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा है कि UCC पर बहस शुरू करना एक राजनीतिक साजिश है। इनमें से किसी ने कभी दूसरों की धार्मिक मान्यताओं और रीति- नीति का विरोध नहीं किया। मौलाना ने कहा कि यह असमानता भारत में सदियों से है, सौ-दो सौ साल पहले या आजादी के बाद पैदा नहीं हुई है। इसलिए, समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत क्यों है, जब नागरिक कानून (सिविल लॉ) एक जैसा नहीं है, तो पारिवारिक कानून (फैमिली लॉ) लागू करने की जरूरत क्यों है?

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