
Vivek Tankha
नई दिल्ली.
पत्रिका कीनोट सलोन में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि कोविड के बाद हमें अपने सरकार चलाने के तरीके को भी बदलना होगा। हम ब्रिटिश काल वाले कानून के सहारे आगे नहीं चल सकते हैं, हमें अब राज्यों में विजनरी मुख्यमंत्री और विजनरी सरकारों की जरूरत होगी। सरकारों को ज्यादा संवेदनशील होकर काम करना होगा। अगर सरकारें संवेदनशील नहीं हैं तो फिर सरकार होने का मतलब ही क्या।
कांग्रेस आरटीआई सेल के नेशनल चेयरमैन और सांसद विवेक तन्खा गुरुवार को पत्रिका कीनोट सलोन में सवालों के जवाब दे रहे थे। शो का मॉडरेशन पत्रिका के शैलेंद्र तिवारी और गोविंद ठाकरे ने किया। विवेक तन्खा ने कहा, अभी चुनौती की शुरुआत है, अब राज्यों में ऐसे मुख्यमंत्रियों की जरूरत है जिनका आर्थिक विजन हो, जो नए रोजगार के बारे में सोचें। पैसा बांटने से कुछ नहीं होगा। कितने अच्छे सलाहकार रखते हैं, यह जरूरी है। आईएएस अफसर सरकार का सपोर्ट सिस्टम हो सकते हैं। लेकिन उनकी सोच का एक दायरा है। वे खुद के लिए काम करते हैं। वह देश के लिए काम नहीं करते। देश के लिए काम करने वाले अफसर कम हैं। अफसरों को अपनी पोस्टिंग की चिंता होती है, भविष्य की चिंता हमेशा उन्हें बेहतर काम करने से रोकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने नाउम्मीद किया
विवेक तन्खा ने कहा कि ऐसे आपात माहौल में सुप्रीम कोर्ट से बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं। लॉकडाउन जिस तरीके से हुआ वो ठीक नहीं था। लेकिन हमें सबसे ज्यादा उम्मीद थी कि लोगों के हितों के लिए सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मजदूरों के लिए कोर्ट ने बोलने में बहुत देर की। अगर वह जल्दी बोलता तो शायद हालात दूसरे होते।
एक घर में एक ही टिकट हो
एक सवाल के जवाब में तन्खा ने कहा, जब 96 में मुशरान साब के रहते मुझे टिकट देने की बात हो रही थी तो मैंने साफ कहा था कि एक घर के भीतर एक ही टिकट होना चाहिए। जब तक वह रहे मैंने राजनीति नहीं की। अभी हाल में जब मेरे बेटे को टिकट देने की बात उठी तो मैंने ट्वीट किया और पार्टी के भीतर भी कहा कि एक घर के भीतर एक ही टिकट होना चाहिए। मैंने अपने बेेटे को साफ कह दिया है कि पहले काम से अपनी जगह बनाओ, फिर तुम तय करो कि तुम्हें राजनीति करनी है, अगर करनी है तो फिर किस पार्टी के साथ करनी है। यह उसका निर्णय होगा, मेरा नहीं। हम लोकतंत्र में हैं और यह आजादी सभी को होनी चाहिए।
सरकारें संवेदनशील बनें, नहीं तो सरकार की जरूरत क्या
उन्होंने कहा, सरकारें संवेदनशील होनी चाहिए, अगर नहीं है तो फिर सरकार होने की जरूरत ही क्या है। संवेदनशीलता हमारे लिए जिंदगी जीने का तरीका हो सकता है, लेकिन सरकारों का जीने का तरीका राजनीति है, उनसे ज्यादा की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इस वक्त में सरकारों को सबके साथ बात करनी चाहिए, आलोचना को भी सलाह के तौर पर लेना चाहिए, भले ही वह आपको पसंद न आए। सुझाव और आलोचना दोनों ही आगे बढ़ने का रास्ता दिखाएंगे।
20 लाख करोड़ में एक रुपया नहीं मिला
विवेक तन्खा ने कहा, 20 लाख करोड़ रुपए का पैकेज दिया, लेकिन किसी को एक रुपया भी मिला हो तो बताएं। विकसित देशों ने डायरेक्ट कैश बेनिफिट दिया। हमारे यहां भी इसकी जरूरत थी। गरीब और मध्यमवर्गीय तत्काल मदद चाहता था, लेकिन सरकार ने उसे कल का भविष्य दिखाया। जिसके पास आज का संकट है, वह कल के सहारे कैसे रहेगा। सरकार को मध्यम वर्ग की भी चिंता करनी चाहिए, जिसकी नौकरी जा रही है। वह बच्चों की फीस नहीं भर पा रहा है और वह किसी के सामने हाथ भी नहीं फैला पा रहा है।
Updated on:
05 Jun 2020 11:27 am
Published on:
05 Jun 2020 11:25 am
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