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तेरह साल में दस किमी दायरे में फैल गया प्रतापगढ़ शहर, फिर भी नहीं है सिटी बस की सेवा

जिला मुख्यालय पर आना हो तो अपना ही साधन लाने की मजबूरी नगर पालिका भी नगर परिषद में बदली प्रतापगढ़. जिला बनने के बाद तेरह वर्ष में शहर की बसावट दोगुनी हो गई, ट्रैफिक दोगुना हो गया। जो शहर पहले चारदीवारी तक सीमित था, वह चार दीवारी की हदें पार कर दस वर्ग किलोमीटर दूर तक फैल गया। यहां तक कि शहरी सरकार का सबसे बड़ा निकाय नगर पालिका भी नगर परिषद में बदल गई। लेकिन शहर में अभी तक सिटी बसें शुरू नही हुई।

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प्रतापगढ़. जिला बनने के बाद तेरह वर्ष में शहर की बसावट दोगुनी हो गई, ट्रैफिक दोगुना हो गया। जो शहर पहले चारदीवारी तक सीमित था, वह चार दीवारी की हदें पार कर दस वर्ग किलोमीटर दूर तक फैल गया। यहां तक कि शहरी सरकार का सबसे बड़ा निकाय नगर पालिका भी नगर परिषद में बदल गई। लेकिन शहर में अभी तक सिटी बसें शुरू नही हुई। इससे समस्या यह है कि यदि किसी को शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक जाना हो तो खुद का साधन ही लेना पड़ेगा।

प्रतापगढ़ जिला घोषित हुआ था, तब शहर का फैलाव ज्यादा नहीं था। धरियावद नाके से लेकर जीरो माइल चौराहे तक ही इसकी बसावट थी। लेकिन धीरे-धीरे इसका विस्तार होता गया। शहर में नई कॉलोनियां बढ़ती गई और अब शहर की बसावट करीब दस वर्ग किलोमीटर तक हो गई। शहर में वर्ष 2011 की जनगणना में शहर की जनसंख्या 42 हजार के करीब थी, जो अब 60 हजार होने का अनुमान है। शहर में विगत दस साल में एक दर्जन नई कॉलोनियां बन गई।
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अमलावद से बांसवाड़ा रोड तक बसी कॉलोनियां
अब शहर में बांसवाड़ा रोड, अरनोद रोड, मंदसौर रोड, नीमच रोड और धरियावद रोड पर कई सारी नई कॉलोनियां बस गई। छोटीसादड़ी रोड पर बगवास कभी शहर से बाहर का इलाका था, लेकिन अब यह शहर का एक हिस्सा हो गया है। इसी प्रकार नीचम रोड पर अमलावद तक शहरी बसावट हो गई। यही हाल अरनोद और मंदसौर रोड का है। धरियावाद रोड पर आरटीओ तक बसावट हो रही है। मिनी सचिवालय सहित अधिकांश सरकारी दफ्तर इसी रोड पर है। हाट सालमगढ़ गांव कभी वीरान रहता था। आज यहां खेल गांव सहित अन्य कॉलोनियां बस गई है।
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शहर में बढ़ गया यातायात का दबाव
सिटी बस सेवा नहीं होने से शहर में निजी साधन ही यातायात के एकमात्र साधन हैं। इसके कारण शहर में ट्रैफिक का दबाव बढ़ गया। जीरो माइल चौराहे से लेकर नीमच नाके तक शहर की मुख्य सडक़ पर दिनभर वाहनों की रेलमपेल रहती है। यहां तक कि शहर के मुख्य बाजार में भी दो पहिया वाहनों की भरमार रहती है। जिला मुख्यालय पर सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था नहीं है। बाहर से खरीददारी करने आने वाले लोग भी अपने वाहनों से ही आते हैं। इसके चलते शहर में वाहनों का दबाव अत्यधिक बढ़ गया।
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अस्पताल जाना पड़ता है महंगा
जिला मुख्यालय पर सिटी बसें नहीं चलने के कारण इमरजेंसी में भी लोगों का ऑटोरिक्शा का उपयोग करना पड़ता है जो महंगा पड़ता है, दूसरा उसकी उपलब्धता भी नहीं है। यदि नीमच रोड पर रहने वाले किसी परिवार को जिला अस्पताल जाना पड़े तो उसे अपने साधन से ही जाना होगा। या ऑटोरिक्शा बुलाना पड़ेगा जो बहुत महंगा पड़ेगा। इसी तरह मिनी सचिवालय जाने के लिए भी परिवहन का कोई सार्वजनिक साधन नहीं है। प्रशासनिक, व्यावसायिक कारणों के चलते करीब दो हजार लोग प्रतिदिन बाहर से आते हैं। शहर में सार्वजनिक परिवहन सेवा नहीं होने के कारण इन्हें अपने गांव से निजी साधन से ही आना पड़ता है।