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यहां होती है अंगूठे के आकार के शिवलिंग की पूजा

प्राकृतिक छंटाओं के बीच अवस्थित है दीपेश्वर महादेव मंदिर

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pratapgarh

यहां होती है अंगूठे के आकार के शिवलिंग की पूजा
प्राकृतिक छंटाओं के बीच अवस्थित है दीपेश्वर महादेव मंदिर
होता है तीर्थ स्थल का अहसास
प्रतापगढ़

शहर के पश्चिम में दीपेश्वर तालाब के किनारे दो जलधाराओं के संगम स्थल के निकट दीपेश्वर का शिव मंदिर बना हुआ है। जो विशालकाय कई किस्मों के पेड़ों के बीच अवस्थित है। यहां मंदिर में शिवलिंग अंगूठे के आकार का है। जिसकी पूजा-अर्चना की जाती है। शिवलिंग की जलाधारी का शिल्प भी अनूठा है। सुबह-शाम यहां पूजा-अर्चना के दौरान वातावरण में मधुरता घुल जाती है। वैसे यहां पहुंचते ही प्राकृतिक वातावरण मन आनंदित हो जाता है। लेकिन मंदिर के निकट बनी लघु देवकुलिकाएं यहां तीर्थ स्थल का अहसास कराती हैं। कहा जाता है कि आखेट के लिए निकले तत्कालीन कुंवर दीपसिंह को जलमग्न एक गाय दिखाई दी। यहां भूमि पर दीपसिंह को लगा कि दूध से तर जमीन के नीचे कुछ है। खुदाई करने पर अंगूठे के आकार का शिवलिंग निकला। इसके बाद यहां दीपसिंह ने मंदिर बनवाया। इतिहासविद् मदन वैष्णव के अनुसार बाद में यहां मंदिर के सामने दीप स्तम्भ भी बनवाया। अठखेली करती जलधारा को रोक कर दीप सरोवर बनवाया गया। जो दीपेश्वर तालाब के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर देव स्थान विभाग के अधीन है। वैसे तो यहां वर्षपर्यंत ही विभिन्न आयोजन होते है। और सुबह से शाम तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लेकिन यहां महाशिवरात्रि , सावन मास में विभिन्न आयोजन के तहत मेले सा माहौल रहता है। इसी परिसर में खड़े गणपति की प्रतिमा भी काफी चमत्कारी है। राधाकिशन पालीवाल का कहना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं पूरी होती है।
विशालकाय पेड़ों के झुरमुट में कई जीवों का आश्रय
यहां दीपेश्वर परिसर में विशालकाय पेड़ और कई किस्मों के पौधे, लताएं विद्यमान है।इनमें कई जीव-जंतु आश्रय पाते है। कई प्रकार के पक्षियों की चहचहाहट दिनभर गूंजायमान रहती है।