प्रतापगढ़. जिले में जहां डेढ़ दशक पहले काफी किसान कपास की खेती करते थे। वहीं अब किसानों ने कपास की खेती से कतराने लगा है। ऐसे में रकबा लगातर घट रहा है। जिले में इस वर्ष भी मात्र 7 सौ हैक्टेयर में ही कपास की खेती सिमटकर रह गई है।
जिले में पहाड़ी इलाकों में गत दो दशक पहले तक कांठल में कपास की बहुतायत स्तर पर खेती की जाती थी। लेकिन महंगी होती खेती के कारण कपास का रकबा लगातार कम होता जा रहा है।
ऐसे में अब जिले में बहुत ही कम इलाकों में कपास की खेती रह गई है। इससे अब कहीं-कहीं कपास के खेत देखे जा सकते है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष कपास की बुवाई का आंकड़ा सात सौ हैक्टेयर में सिमट गया है। इसमें भी बीटी कपास की किस्में ही बोई जाने लगी है। देसी किस्म तो कहीं नहीं दिखाई देती है।
कपास में वर्ष में एक ही फसल
कपास की बुवाई में पानी की आवश्यकता होती है। इसकी बारिश शुरू होने से पहले की जाती है। जबकि इसमें उत्पादन अक्टूबर माह से शुरू होता है। जो जनवरी तक होता है। इससे कपास की बुवाई करने वाले खेत में केवल कपास की पैदावार ही ले सकते है। रबी और खरीफ दोनों फसलों के स्थान पर एक ही फसल होती है। इससे भी मोह भंग हो रहा है।
मेहनत अधिक, मुनाफा कम
मेरियाखेड़ी. कपास की खेती में मेहनत अधिक होने और मुनाफा कम होने से किसानों का रुझान कम हो रहा है। किसानों की माने तो कपास में कीट व्याधियों का भी प्रकोप अधिक होने लगा है। शुरुआत में तो कृषकों ने संकर बीजों की बुवाई की, लेकिन मेहनत अधिक व मुनाफा कम होने के कारण कपास की खेती से किनारा कर लिया। दूसरी ओर पिछले कुछ वर्षों से खेतों में कीट व्याधियां बढऩे लगी है। इसका असर कपास की फसल में भी हो गया है। कपास में कीटव्याधि भी अधिक होने लगी है। जिससे कृषकों को इसमें कीटनाशकों का अधिक उपयोग करना पड़ रहा है। जिससे अतिरिक्त आर्थिक भार उठाना पड़ता है। जो किसानों पर भारी पडऩे लगा।जिले में नहीं दिखती देसी किस्म
जिले में कपास की देसी किस्म की बुवाई पहाड़ी क्षेत्रों में बहुतायत क्षेत्र में की जाती थी। इसमें मेहनत अधिक और पैदावार कम होने से किसानों ने किनारा कर लिया। इसके बाद किसानों ने बीटी कॉटन किस्म की बुवाई करने लगे। इससे देसी किस्म तो गायब ही हो गई। वहीं पहाड़ी भागों में भी इसकी जगह अन्य फसलों ले रहे है। जिले बुवाई का आंकड़ा
वर्ष बुवाई का क्षेत्रफल
2007 945
2008 2510
2009 2260
2010 2163
2012 1180
2013 1100
2014 1070
2015 1050
2016 1050
2017 1030
2018 960
2019 900
2020 850
2021 830
2022 750
2023 700
आंकड़ा कृषि विभाग के अनुसार (हैक्टेयर में)