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घट रहे हैं प्रवासी पक्षी: जलाशयों के बीच में टीले से होगी सुरक्षा

संरक्षण की दरकार: पानी कम होना, अवैध दोहन, जलाशयों पर मानवीय गतिविधियां भी बन रही समस्या

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घट रहे हैं प्रवासी पक्षी: जलाशयों के बीच में टीले से होगी सुरक्षा



देवीशंकर सुथार. प्रतापगढ़. सर्दी के मौसम में सात समंदर पार से प्रति वर्ष प्रवास पर पहुंचने वाले मेहमान पङ्क्षरदों की संख्या गत वर्षों से कम होने लगी है। ऐसे में जिले के जलाशयों पर इस वर्ष काफी कम संख्या में दिखाई दे रहे है। इसके पर्यावरणविद् कई कारण बता रहे है। जिनमें से जलाशयों पर पक्षियों की सुरक्षा का अभाव प्रमुख है। इसमें भी जलाशयों पर पक्षियों के आश्रय स्थल का सुरक्षित होना जरूरी होता है। गत कुछ वर्षों से जल संरक्षण को लेकर काफी प्रयास हो रहे है। इसके तहत छोटे से बड़े जलाशयों के लिए परियोजनाएं लागू की जा रही है। कई कार्य किए जा रहे है। जिससे जल संरक्षण हो सके। लेकिन जल संरक्षण के साथ जैव विविधता का संरक्षण भी आवश्यक है। इसके लिए तालाब, जलाशय आदि के बीच में मिट्टी, पत्थर आदि का एक कृत्रिम टीला भी बनाया जाए। जहां पर कई पक्षियों का आशियाना बन सकता है। इसका कारण यह है पक्षियों के लिए रात्रि में सुरक्षा होना नितांत आवश्यक है। जहां भी पानी के बीच में टीला होता है, वहां पक्षी इस पर अपना आशियाना बनाते है। जिससे रात को टीले पर पहुंचने वाले शिकारी जीवों से सुरक्षा मिलती है।


जिले में गत कुछ वर्षों से प्रवासी पक्षियों की संख्या में कमी होने लगी है। इसके कई कारण बताए जा रहे हैं। जिसमें जलाशयों में पक्षियों के लिए आवास के लिए टीले नहीं होना, पानी कम होना, अवैध दोहन होना प्रमुख है। इसके अलावा कुछ इलाकों में शिकार होना भी सामने आया है। जलाशयों पर मानवीय गतिविधियां बढऩे लगी है। जिससे कई प्रजातियों के पक्षी अब दिखाई नहीं दे रहे है।
भोजन की तलाश में दूरदराज से आते हैं प्रतापगढ़
अमुमन प्रतापगढ़ जिले में आने वाले प्रवासी पक्षी हिमालय की तराई वाले इलाकों, मध्य एशिया, उत्तरी इलाकों के देशों से आते है। इसका कारण यह है कि सर्दी में वहां के इलाकों में बर्फ जमने लगती है। इस कारण वहां पर पक्षियों भोजन की समस्या हो जाती है। इस कारण ये पक्षी वहां से उड़ान भरकर यहां मैदानों के जलाशयों पर पहुंचते है। इसके साथ ही प्रजनन के लिए भी कई प्रवासी पक्षी यहां आते है। नवंबर से इनके आगमन की शुरुआत होती है, इसके बाद फरवरी व मार्च के प्रथम सप्ताह तक यहां से लौट जाते है।
एक दर्जन से अधिक प्रजातियों के पक्षी
कांठल में गत कई वर्षों से कई प्रजातियों के पक्षी आते हैं। इसमें सुरखाब(ब्राह्मणी डक), ग्रे ले गूज(राजहंस), बार हैडेड गूज, रडि शल्डक (चकवा-चकवी), कोंब डक्स, पिन टेल्स, ओपेन बिल, कॉमन टेल्स, ग्रे हेरोन कूट, कॉमन पोचार्ड, वूली नेक्ड स्टॉक्र्स समेत कई पक्षी आदि आते है। चार वर्ष पहले यहां फ्लैङ्क्षमगों की भी दस्तक हुई थी। हालांकि अब यह नहीं आ रहे है।

जीवों की सुरक्षा आवश्यक
गत कुछ वर्षों से पर्यावरण संरक्षण को लेकर असंवेदनशील हो गए है। जिससे हमें प्रकृति में हो रहे बदलाव को देखने को मिल रहा है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण अति आवश्यक है। इसके साथ ही सभी जीवों की सुरक्षा करनी होगी। यही बाद प्रवासी पक्षियों पर भी लागू होती है। इन पक्षियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कहीं ना कहीं भूमिका होती है। गत वर्षों से प्रवासी पक्षियों का काफी कम दिखना भी इसी तरफ इंगित करता है। हमें इनकी सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा।
मंगल मेहता, पर्यावरणविद्, प्रतापगढ़

जल संरक्षण के साथ हो जैव विविधता का संरक्षण
जलाशयों के संरक्षण के साथ जैव विविधता का भी ध्यान रखना होगा। इसका कारण यह है प्रवासी पक्षियों का डेरा जलाशयों पर होता है। जहां ये पक्षी दिन को छीछले पानी और आसपास के खेतों में विचरण करते है, जहां पर कीट-पंतगों का भक्षण कर उदरपूर्ति करते है। लेकिन रात को विश्राम के लिए सुरक्षित स्थान की आवश्यकता होती है। जो पानी के बीच में टीला प्रमुख होती है। जलाशयों के बीच में कृत्रित टीले बनाने पर हम जल संरक्षण के साथ जैव विविधता संरक्षण कर पर्यावरण बचाने में बहुपयोगी योगदान कर सकते है। महानेरगा के तहत ग्राम पंचायत, जल संसाधन, वन विभाग की योजनाओं में इसे क्रियांविति कर सकते है। अगर इस तरह की छोटे से कार्य की शुरुआत करते है तो आने वाले समय में जल संरक्षण के साथ जैव विविधता का भी संरक्षण होगा।
सुनील कुमार, उपवन संरक्षक, प्रतापगढ़