
मां बाड़ी केन्द्र : न समय पर खुलते हैं, न पूरी सुविधा है
प्रतापगढ़.बारावरदा. जनजाति उपयोजना क्षेत्र(टीएसपी) में कामकाजी जनजाति परिवारों के बच्चों को शिक्षा और पौष्टिक आहार उपलब्ध करवाने के लिए संचालित जिले के मां बाड़ी केन्द्रों में समय पर खाद्य और बच्चों के उपयोग की सामग्री नहीं पहुंच रही है। इन केन्द्रों पर स्टाफ की कमी है और जहां हैं, वहां स्टाफ पूरे दिन नहीं रूकता। नतीजा यह होता है कि बच्चे निर्धारित संख्या में नहीं आ पाते।
सरकार ने यह योजना टीएसपी क्षेत्र के उन आदिवासी परिवारों के लिए शुरू की थी, जो कृषि कामकाज के कारण घर से बाहर रहते है और घर में बच्चों की परवरिश नहीं हो पाती। ऐसे परिवारों के बच्चों को मां बाड़ी केन्दों में भेजकर उनके भोजन व पढ़ाई की व्यवस्था सरकार करती है। बच्चों को नाश्ता और दोपहर के भोजन क साथ पोशाक व स्वेटर आदि उपलब्ध कराया जाता है।
जिले में 379 मां बाड़ी केन्द्र हैं। उनमें से अधिकांश की हालात खराब है। केन्द्रों पर समय सामग्री नहीं पहुंचती। प्रतापगढ़ में तो आदिवासी छात्रावासों और मांबाड़ी केन्द्रों में इस वर्ष वितरण के लिए जनजाति विभाग मेें सामग्री फरवरी मे आई है, जबकि शैक्षणिक सत्र पूरा होने वाला है।
इन केन्द्रों का हाल ये है कि मां बाड़ी डे केयर सेंटरों का पूरे दिन सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक खुलना आवश्यक है, लेकिन कई स्थानों पर पूरे ये सेंटर पूरे समय नहीं खुलते। पत्रिका ने जब इन सेंटरों में से कुछ का जायजा लिया तो पता चला कि कई सेंटरों पर स्टाफ पूरे दिन नहीं ठहरता सुबह दो तीन घंटे खोलने के बाद शिक्षक और सहायक स्टाफ बंद कर चला जाता है। प्रत्येक केन्द्र पर अधिकतम तीस बच्चों की क्षमता है।
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फोटो...केस एक : खंडाई खेड़ा मां बाड़ी डे केयर सेंटर
खंडाई खेड़ा केंद्र में अवलोकन के दौरान 22 बालक बालिका थी। दोनों ही अध्यापक मौके पर नहीं मिले। ग्रामीणों का कहना है कि केेन्द्र पूरे समय नहीं खुलता। कभी जल्दी बंद होजाता है। कभी खुलता ही नहीं है। बच्चों को सुबह का नाश्ता और दोपहर का भोजन देने का प्रावधान है, लेकिन इस केन्द्र पर बच्चों को सिर्फ एक टाइम ही भोजन दिया जाता है। नाश्ता वगैरह नहीं दिया जाता।
....फोटो...केस दो : दातलाघाटा मां बाड़ी केन्द्र
दातला घाटा के मां बाड़ी केन्द्र में 23 बच्चे मिले। यहां पर भी बच्चों ने बताया कि एक टाइम ही भोजन मिलता है। आसपास के ग्रामीणों से पूछा गया तो बताया गया कि केन्द्र नियमित रूप से नहीं खुलता। केन्द्र में निर्धारित मीनू के हिसाब से बच्चों को भोजन नहीं मिल रहा है। यहां दो अध्यापक कार्यरत हैं। एक अध्यापिका है और एक अध्यापक हैं। यहां मौजूद अध्यापक ने बताया कि वह एक स्टाफ सुबह 8.00 बजे से 12.00 बजे तक यहीं रहता है। दूसरी महिला अध्यापिका है जो 12.00 बजे आती है और शाम को 4- 5 बजे तक रहती हैं। खाना बनाने के लिए हेल्पर है ।
ये है प्रावधान
- प्रत्येक मां-बाड़ी केन्द्र पर जनजाति/ कथौड़ी एवं सहरिया समुदाय के 6 से 12 वर्ष के शिक्षा से वंचित 30 बालकों को प्रारम्भिक शिक्षा के लिए भर्ती करना। इसमें बालिकाओं को वरीयता दी जाती है।
- मां बाड़ी केन्द्रों पर बालक-बालिकाओं को नाश्ता और दोपहर में पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना।
-प्रत्येक बालक-बालिकाओं को पोशाक, जूते, मौजे, टाई, बेल्ट तथा स्वेटर उपलब्ध कराना।
- खेतीहर मजदूरों के बच्चों का पलायन रोकना तथा अनवरत अध्ययन में सलंग्न करना।
-खेलो के माध्यम से बालक/बालिकाओं को षिक्षण कार्य को रूचिकर बनाना।
-अध्ययनरत बच्चों की माताओं को मां-बाड़ी की गतिविधियों से जोडऩा।
- बच्चों के भोजन तैयार करने के लिए 2 जनजाति महिलाओं को प्रत्येक महीने बारी-बारी से दायित्व सौपना और मानदेय देना एवम् स्वयं भोजन करना और बच्चों को भोजन कराना।
- जनजाति/कथौड़ी/सहरिया महिलाओं को प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम से मां-बाड़ी केन्द्र के साथ जोडऩा।
- स्वास्थ्य, स्वच्छता के उत्थान हेतु राज्य सरकार की योजनाओं की जानकारी उपलब्ध करना।
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ये आई मुख्य कमियां
- समय पर और नियमित रूप से नहीं खुलते डे केयर सेंटर
- दोनों टाइम का भोजन नियमित रूप से नहीं मिलता
- भोजन मीनू के अनुसार नहीं मिलता
- अधिकांश समय स्टाफ नदारद। हेल्पर के भरोसे रहता है सेंटर
- अभिभावकों विशेषकर माताओं को सेंटर पर नहीं बुलाया जाता
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जिले में मां बाड़ी केन्द्रों की संख्या
ब्लॉक संख्या
प्रतापगढ़ 90
अरनोद 73
धरियावद 63
पीपलखूंट 103
छोटीसादड़ी 50
कुल 379
Published on:
29 Feb 2020 12:56 pm
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