मिट्टी में पोषक तत्वों की हो रही कमी
अधिक उत्पादन की चाहत में रसायनों का कर रहे अधिक उपयोग
प्रतापगढ़. पिछले कुछ वर्षों से खेतों में फसलों के अधिक उत्पादन लेने के लिए जहां किसान कई प्रकार के रसायनों, कीटनाशकों का उपयोग करने लगा है। ऐसे में कांठल की धरा भी दूषित होने लगी है। यहां के किसान भी अन्य इलाकों के किसानों की देखा-देखी अपने खेतों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग करने लगे है। जिससे खेतों की सेहत खराब होती जा रही है। कई खेतों में तो हालत यह है कि लगातार रसायानों व कीटनाशकों के छिडक़ाव के कारण कई फसलों का उत्पादन भी कम होता जा रहा है। ऐसे में किसानों को अभी से खेतों की सेहत को लेकर जागरुक होना पड़ेगा। इसके अभाव में खेतों की उर्वरा शक्ति कम हो रही है।
गौरतलब है कि खेतों में फसल उत्पादन बढ़ाने के लिएं किसान जरूरत से अधिक रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं। जबकि किसान अपनी परम्परागत जैविक खाद और विधियों को भूलते जा रहे हंै। जिससे खेतों में उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। इसके साथ ही यहां खेतों में जो खाद्यान्न पैदा हो रहा है, वह भी गुणवत्ता में कमी वाला होता है। जिससे कई बीमारियोंं का खतरा भी बना रहता है। वहीं दूसरी ओर कांठल में पिछले समय से असंतुलित उर्वरक के प्रयोग से मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा का अनुपात बिगड़ता जा रहा है। इसका प्रमुख कारण गोबर व जैविक खाद नहीं डालना है। जिसके फलस्वरूप फसलों के लिए आवश्यक तत्वों की कमी आने लगी है।
फसलों के लिए ये तत्व होते है आवश्यक
अमुमन फसलों के लिए १६ प्रमुख तत्वों की आवश्यकता होती है। जिसमें फसलें तीन तत्व हवा, पानी से ग्रहण करती है। जबकि १३ पोषक तत्व भूमि से लेती है। आवश्यक तत्वों में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम प्रमुख है। इसके अलावा कैल्शियम, सल्फर और मैंगनीज तत्व द्वितीय पोषक तत्व है। जबकि जस्ता, कॉपर, बोरोन, मोलिब्डेनम, क्लोरीन, सोडियम, कोबाल्ट, सिलिकॉन सूक्ष्म तत्व होते है।
कांठल में होने लगी जिंक और लोहा की कमी
प्रतापगढ़ जिले में प्रमुख सूक्ष्म तत्व जिंक और लोहा की कमी अधिक पाई गई है। कृषि विशेषज्ञों के अुनसार जिले के प्रमुख ५१ क्षेत्रों को चिह्नित किया गया। जिसमें पाया गया कि जिंक और आयरन की कमी है। यहां मिट्टी में १८ से लेकर ३६ प्रतिशत ही जिंक और लोहा की मात्रा पाई गई है। जो फसलों के लिए आवश्यक है।
लगातार कम हो रहा जैव कार्बनिक स्तर
कांठल की मिट्टी में पिछले वर्षों से गोबर की खाद का कम उपयोग और जैविक खाद का उपयोग नहीं किए जाने के परिणाम स्वरूप मिट्टी में कार्बनिक स्तर घटता जा रहा है। वहीं कई खेतों में मिट्टी भी बंजर होती जा रही है। मिट्टी की जांच में सामने आया है कि मिट्टी का कार्बनिक स्तर ०.२ प्रतिशत से भी कम हो गया है। जबकि उपयुक्त खेती के लिए यह मात्रा ०.७५ प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए। इसके शून्य स्तर पर आने पर खेती करना असम्भव हो जाता है। जमीन अनुपजाऊ बन जाती है।
इस तरह बन सकती है मिट्टी की सेहत
मिट्टी में कार्बनिक स्तर बढ़ाने के लिए किसानों को पारम्परिक खेती अपनानी होगी। फसल कटाई के बाद में अधिकांश किसान फसल अवशेषों को खेत में ही आग लगा देते है। जो खेती के लिए काफी नुकसानदायक है। इससे मिट्टी में मौजूद जीवाणु एवं कार्बनिक पदार्थ जलकर नष्ट हो जाते है। इस कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। ऐसे में फसलों के अवशेष को हंकाई, रोटावेटर कर मिलानी चाहिए। इसके अलावा पोषक तत्वों की पूर्ति करने वाले सभी संसाधन जिसमें खाद, उर्वरक, जैव उर्वरक, वर्मी कम्पोस्ट, फसल अवशेष का समुचित प्रयोग करना चाहिए। दलहनी फसलें राइजोबियम नामक जीवाणु के सहयोग से वायुमंडल का नाइट्रोजन पौधों की जड़ों में संग्रहित करने में सक्षम होती है। राइजोबियम कल्चर से बीजोपचार कर बुवाई करने पर इन फसलों की उपज में सार्थक वृद्धि होती है। अनाज एवं सब्जी वाली फसलों में एजोटोबेक्टर, एजोस्पिरिलम तथा फास्फोरस के घुलनशील बनाने वाले जैव उर्वरकों का आवश्यक मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। तरल जैव उर्वरक उपलब्ध है जो पाउडर वाले जैव उर्वरकों की अपेक्षा काफी अधिक फायदेमंद है। वर्मी कम्पोस्ट फसल अवशेषों एवं गोबर की खाद को केंचुओं की मदद से कम्पोस्ट तैयार की जाती है। जो सामान्य कम्पोस्ट से अच्छी होती है।
गोबर और जैविक खाद सबसे अच्छा विकल्प
फसलों में आवश्यक तत्वों की पूर्ति के लिए गोबर और केंचुआ खाद सबसे अच्छा विकल्प है। इसके उपयोग से मिट्टी में सभी आवश्यक तत्वों की पूर्ति हो जाती है। कृषि विज्ञान केन्द्र प्रभारी डॉ. योगेश कनोजिया ने बताया कि जिले में खेतों में गोबर की खाद नहीं डालने से उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। वहीं आवश्यक पोषक तत्वों की भी कमी होती जा रही है। ऐसे में गोबर की खाद डालना आवश्यक है। जिससे खेतों की उर्वरा शक्ति बनी रहे। इसके साथ ही खेतों की मिट्टी की समय-समय पर जांच करानी आवश्यक है। जिससे पोषक तत्वों के बारे में पता चल सके और खेत में पोषक तत्वो की पूर्ति की जा सके।