
शहर को पहचान देने वाला मोती महल ढह गया, 114 साल पुरानी इस विरासत को बचाया न जा सका
प्रयागराज। निर्मल वर्मा का निबन्ध (पत्थर और बहता पानी) के कुछ शब्द अक्सर सोचता हूं कि वे शहर कितने दुर्भागे हैं। जिनके अपने कोई खंडहर नही। उनमें रहना उतना ही भयानक अनुभव हो सकता है, जैसे किसी ऐसे व्यक्ति से मिलना। जो अपनी स्मृति खो चुका है जिसका कोई अतीत नहीं। अगर मुझसे कोई नरक की परिभाषा पूछे तो वह हैए हमेशा वर्तमान में रहना एक अंतहीन रोशनी जहां कोई छाया नहीं जहां आदमी हमेशा आंखें खोले रहता है। नींद और स्वप्न और अंधेरे को भूलकर। जहां वर्तमान शाश्वत है वहां शाश्वत भी अपना मूल्य खो देता है। क्योंकि जो चीज शाश्वत को आयाम देती है . समय . वह खुद कोई मूल्य नहीं रखता।
1905 में बना था सिनेमा घर
शहर की ऐतिहासिक और खूबसूरत पहचान मोती महल सिनेमा घर 114 बरस का सफर पूरा करके ढह गया।इसका निर्माण 1905 मोती महल तीसरा सबसे पुराना सिनेमा घर था। जिसके ढहने के साथ ही तमाम यादें पुराने किस्से और लोगों के लिए इसके होने के मायने सोशल मीडिया पर छा गए। 80 के शुरुआती दशक में जब लोगों के घरों में डीवीडी या सीडी नहीं थी तब फिल्म देखने वालों से मोती महल गुलजार रहा करता था। लोगों की भीड़ तो एक बार फिर लगी लेकिन मोती महल के उस इतिहास के मलबे को देखने के लिए जिसमें अनेक प्रेमी जोड़ों से लेकर नए दंपत्ति तक के जीवन की शुरुआत यादें छिपी थी।
पर्ल से मोती महल तक
मोती महल का निर्माण हुआ तब इसका नाम पर्ल टॉकीज रखा गया था। इसका निर्माण कोलकाता के एक सेठ में करवाया जो बाद में शहर के जाने.माने सिनेमा उद्यमी निरंजन लाल भार्गव की देखरेख में चला गया। निरंजन लाल भार्गव ने शहर में चार, सिनेमा घर बनवाए जिनमें निरंजन विशंभर मोती महल और रूपबानी शामिल था ।हालांकि कुछ दिनों बाद इसे प्रतापगढ़ के व्यापारी के हाथों बेच दिया गया। कोलकाता की सेठ ने जब इस भार्गव को दिया भार्गव ने इसका नाम पर टॉकीज से हटाकर मोती महल कर दिया था।
1989 में आखिरी फिल्म चली
जानकारों की माने तो मोती महल में आखरी बार 1989 में फिल्म काली टोपी लाल रुमाल को अंतिम बार यहां पर्दे पर दिखाया गया था। मोतीमहल सिनेमा हॉल कई दशक पहले ही बंद हो चुका था और इसकी बिल्डिंग काफी जर्जर हो चुकी थी । लगातार बरसात के चलते अचानक सिनेमा हॉल की पुरानी बिल्डिंग का एक हिस्सा जमींदोज हो गया और बिल्डिंग का पूरा मलवा गिरने से सड़क पर फैला गया । यह सब कुछ अचानक हुआ और जब यह हादसा हुआ उस वक्त सड़क पर यातायात नही के बराबर था नहीं तो कई लोगो की जान जा सकती थी । यह शुक्र की बात है कि एक रिक्शा वाला बाल बाल बच गया क्योकि चंद मिनट पहले वह रिक्शा से उतर कर पानी पीने गया था।
क्या कहा लोगों ने
सोशल मिडिया पर शोध छात्र अजीत सिंह लिखते है की संरक्षण समय पर किया जा सकता था। ऐसी कई बिल्डिंग अभी भी खड़ी हैं जो शहर के इतिहास को बुलन्दी देती हैं। बाकी सरकारों की अपनी वरीयता होती है। कुछ ने राम को छोड़ा कुछ ने तिलक को छोड़ा कुछ ने अरविंदो को कुछ ने सावरकर को छोड़ा और कुछ ने गाँधी को।सच कहूँ यह सब हमारे पुरखे थे यह सब हममें से सभी से महान थे। कुछ तो पुरखों की निशानियां बचा ले यह पर्यटन का केंद्र बन सकता था लेकिन यह वर्तमान सरकार के डेवेलपमेंट के जद में नही आ सका हो।
Updated on:
17 Sept 2019 01:20 pm
Published on:
17 Sept 2019 12:15 pm
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