
इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी को गलत तरीके से नियुक्त किया गया है तो दूसरे उसे दष्ष्टान्त रूप में पेश कर स्वयं की भी नियुक्ति की मांग नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि कोर्ट पर कानून के शासन को लागू करने की जिम्मेदारी है। उससे कानून के विपरीत आदेश जारी करने की मांग नहीं की जा सकती। कोर्ट ने प्राथमिक विद्यालयों में 11 माह के लिए संविदा पर अनुदेशकों की नियुक्ति अर्हता में ढील देने की मांग में दाखिल याचिकाएं खारिज कर दी है।
यह आदेश न्यायमूर्ति एस.पी केशरवानी ने श्रीमती विमलेश कुमारी व 74 अन्य की याचिका पर दिया है। 31 जनवरी 2013 के शासनादेश से इंटरमीडिएट कला विषय में पास या बी.ए पास अभ्यर्थियों को अनुदेशक पद पर मानदेय देकर नियुक्ति का फैसला लिया गया। जो कला विषय के साथ इण्टर या बीए पास नहीं थे, उन्हें चयन में शामिल नहीं किया गया। महाराष्ट्र से प्राविधिक कला विषय में इंटर पास व सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से शास्त्री पास अभ्यर्थियों को चयन में शामिल नहीं किया गया तो उन्होंने याचिका दाखिल की।
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याचियों का कहना था कि ड्राइंग ग्रेड को कला विषय माना जाय और शास्त्री को बीए के समकक्ष होने के नाते मान्य किया जाय। याचियों का कहना था कि दूसरे जिलों में ड्राइंग डिग्री वालों को कला विषय में शामिल करते हुए नियुक्त किया गया है। कोर्ट ने कहा कि शासनादेश की वैधता को चुनौती दी गयी है किन्तु उस पर बहस नहीं की गयी। ऐसे में शासनादेश वैध है और इसके तहत निर्धारित अर्हता ही मान्य है। कोई यह नहीं कह सकता कि दूसरे जिले में गलत नियुक्ति हुई है तो उन्हें भी नियुक्त किया जाय। गलत कार्य के लाभ की मांग नहीं की जा सकती। कोर्ट ने याचिकाओं को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया है।
Published on:
13 Dec 2017 08:38 pm
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