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पिता के साथ रहना चाहता था बच्चा, फिर भी कोर्ट ने माँ को सौंप दी कस्टडी, कहा-उसका भविष्य अहम

प्रयागराज में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी मामले में अहम फैसला देते हुए माँ को संरक्षण सौंप दिया। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की इच्छा से ज्यादा उसका भविष्य, शिक्षा और सुरक्षा महत्वपूर्ण है।

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Court orders

कोर्ट (फाइल फोटो)

Prayagraj News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में बच्चे की कस्टडी (संरक्षण) से जुड़े एक मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब बात किसी बच्चे के भविष्य की हो, तो केवल उसकी इच्छा ही काफी नहीं होती, बल्कि उसका सर्वांगीण विकास, शिक्षा और सुरक्षा सबसे ऊपर होती है। न्यायमूर्ति संदीप जैन ने डॉ. भावना सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए नाबालिग बच्चे की कस्टडी पिता से लेकर माँ को सौंपने का आदेश दिया है।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक 10 वर्षीय बच्चे की कस्टडी को लेकर था। बच्चे की माँ (याची), जो पेशे से एक डॉक्टर हैं, ने कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus) दाखिल की थी। माँ का तर्क था कि बच्चे का पिता शराब की लत से जूझ रहा है और आर्थिक रूप से भी सक्षम नहीं है, जिससे बच्चे का भविष्य अंधकार में पड़ सकता है। दूसरी ओर, पिता का कहना था कि बच्चा मेरठ में उनके साथ रह रहा है और बच्चा खुद पिता के पास ही रहना चाहता है।

कोर्ट ने बच्चे की इच्छा पर क्या कहा?

आमतौर पर माना जाता है कि बच्चा जिसके साथ रहना चाहे, कस्टडी उसे ही मिलनी चाहिए। लेकिन इस मामले में हाईकोर्ट ने एक अलग और गंभीर दृष्टिकोण अपनाया। कोर्ट ने जब बच्चे से बात की, तो पाया कि उसके बयान 'प्रभावित' लग रहे थे (यानी उसे सिखाया-पढ़ाया गया था)।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि कस्टडी के मामलों में बच्चे का सर्वोत्तम हित ही सर्वोपरि है। केवल बच्चे की पसंद ही अंतिम फैसला नहीं हो सकती, क्योंकि एक छोटा बच्चा यह समझने में सक्षम नहीं होता कि लंबी अवधि में उसके भविष्य के लिए क्या सही है।

माँ और पिता की स्थिति का आकलन

कोर्ट ने दोनों पक्षों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की तुलना की:-

माँ की स्थिति: माँ एक योग्य डॉक्टर हैं और आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं। उन्होंने बच्चे के भविष्य के लिए शिमला के एक प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल में दाखिला कराया है और भारी-भरकम फीस भी जमा की है।

पिता की स्थिति: कोर्ट ने पाया कि पिता को शराब की गंभीर लत है और उनका लिवर ट्रांसप्लांट भी हो चुका है। उनके इलाज का खर्च भी उनके परिवार ने उठाया, जिससे साबित हुआ कि वे आर्थिक रूप से स्थिर नहीं हैं।

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि शिमला का स्कूल बच्चे को उच्च स्तरीय शिक्षा और विकास के बेहतर अवसर दे सकता है। इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि बच्चे की कस्टडी माँ को सौंपी जाए ताकि वह शिमला में अपनी पढ़ाई जारी रख सके। पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को महीने में एक बार स्कूल जाकर बच्चे से मिलने का अधिकार होगा। स्कूल के हेडमास्टर को इन मुलाकातों की उचित व्यवस्था करने की जिम्मेदारी दी गई है।