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मर्जी से शारीरिक संबंध बनाना रेप नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला भी दिया।

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High Court प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source - Patrika)

Consensual Sex is not Rape Allahabad High Court Big Decision: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी महिला ने अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाए हैं, तो उसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। अदालत ने आरोपी नीरज और अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस को रद्द कर दिया। यह फैसला न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकलपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों और सबूतों को ध्यान से देखा, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया।

सबूतों की कमी पर टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने पीड़िता की कोई फोटो या वीडियो वायरल की थी। अदालत ने यह भी पाया कि दोनों के बीच वॉट्सऐप पर नियमित बातचीत होती थी। इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों एक-दूसरे के संपर्क में थे और बातचीत सामान्य रूप से चल रही थी। ब्लैकमेल करने का आरोप भी साबित नहीं हो पाया। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोप लगा देने से अपराध साबित नहीं होता, उसके लिए पुख्ता सबूत जरूरी होते हैं।

शिकायत में देरी पर सवाल

अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि पीड़िता ने एफआईआर दर्ज कराने में काफी देरी की। कोर्ट ने कहा कि अगर शादी का वादा शुरू से ही झूठा था, तो पीड़िता को तुरंत शिकायत करनी चाहिए थी। लेकिन उसने करीब एक साल तीन महीने बाद रिपोर्ट दर्ज कराई। इस देरी से यह संकेत मिलता है कि संबंध आपसी सहमति से थे।

बयान में विरोधाभास

कोर्ट ने यह भी देखा कि पीड़िता ने पहले कहा था कि उसने अपनी मर्जी से संबंध बनाए। बाद में उसने कहा कि वह दबाव में थी। अदालत ने कहा कि एक विवाहित महिला अगर लंबे समय तक किसी के साथ संबंध बनाए रखे और फिर बाद में दबाव की बात करे, तो इसे समझना कठिन है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र

अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने निर्णय का भी हवाला दिया। कोर्ट ने प्रशांत बनाम दिल्ली राज्य मामले का जिक्र करते हुए कहा कि अगर दो लोग लंबे समय तक रिश्ते में रहते हैं, तो यह मानना मुश्किल होता है कि एक पक्ष पूरी तरह दबाव में था। इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज केस को रद्द करने का आदेश दिया।