
High Court orders a major case between husband and wife इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पति पत्नी के एक मामले में बड़ा निर्णय दिया है। जिसमें उन्होंने कहा कि पति को नपुंसक बताए जाने पर पत्नी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा नहीं किया जा सकता है। जब इसके साक्ष्य मौजूद हो, मेडिकल रिपोर्ट भी यही कहती है। दरअसल हाई कोर्ट एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। जिसमें वह पति की तरफ से लगाए गए मानहानि के मामले में निचली अदालत से आए आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट में निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया।
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि पत्नी ने पति को नपुंसक बताया है और मेडिकल साक्ष्य भी हैं, जो विवाह के पूर्ण न होने जैसे तथ्यों पर आधारित है, तो इसे मानहानि नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट कल्याण महिला के लिए राहत भरी है। अदालत ने यह भी साफ किया कि ऐसी परिस्थिति तलाक के लिए वैध आधार बन सकती है।
मामला एक महिला की याचिका से जुड़ा है, जिसमें उसने आपराधिक मानहानि मामले में जारी समन आदेश को चुनौती दी थी। यह आदेश निचली अदालत में दिया गया था। पति ने महिला पर आरोप लगाया था कि पत्नी ने उसे नपुंसक कहकर उसकी छवि को धूमिल किया है। यह आरोप लगाते हुए पति ने मानहानि का मुकदमा दर्ज किया था।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार मिश्र-प्रथम (Justice Arvind Kumar Mishra-I) की एकल पीठ में मामले की सुनवाई हुई। जिसमें अदालत ने कहा कि यदि पत्नी ने यह बयान दुर्भावना से नहीं बल्कि तथ्यों के आधार पर दिया है, तो इसे भारतीय कानून के तहत आपराधिक और मानहानि नहीं माना जा सकता। साक्ष्यों के आधार पर बयान दिया गया है। अदालत ने यह भी कहा की पत्नी यदि बिना किसी मेडिकल साक्ष्य के इस तरह का आरोप लगाती तो निश्चित रूप से मानहानि के दायरे में आता।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पति की शारीरिक अक्षमता से जुड़ी बातों की पुष्टि मेडिकल परीक्षण रिपोर्ट में हो रही है। विवाह के बाद की जिम्मेदारियों को पति शारीरिक अक्षमताओं के कारण पूरी नहीं कर पा रहा है। ऐसे में महिला का पति नपुंसक कहना कोई अपराध नहीं है। उसके साथ ही अदालत में महिला के खिलाफ निचली अदालत से दिए गए आदेश को रद्द कर दिया।
Published on:
21 May 2026 08:30 am
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