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दहेज उत्पीड़न मामले में हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी- पति के पूरे परिवार को फंसाना आम प्रथा, याचिका खारिज की

Major comment of Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न मामले में महिला पक्ष पर बड़ी टिप्पणी की है, जिसमें उसने कहा है कि पति के परिवार के सदस्यों को मुकदमे में शामिल करने की सामान्य प्रथा बनती जा रही है।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, फोटो सोर्स- ChatGPT

फोटो सोर्स- ChatGPT

Allahabad High Court big decision in dowry harassment case: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के मामले में बड़ी टिप्पणी की है। एक याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि पति के परिवार के सभी सदस्यों को दोषी बनाने की अब सामान्य प्रथा बन गई है। सभी सदस्यों के खिलाफ मुकदमा लिख दिया जाता है, जबकि कई बार उनके खिलाफ कोई ठोस आरोप नहीं मिलते हैं। यह कहते हुए अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया। दरअसल अदालत में एक याचिका दाखिल की गई थी, जिसमें महिला की तरफ से पति के परिवार के सदस्यों में सास, ससुर और रिश्तेदारों को आरोपी बनाए जाने की मांग की गई थी, जिस पर सुनवाई करते हुए याचिका खारिज कर दिया गया।

दहेज उत्पीड़न की हो रही थी सुनवाई

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट दहेज उत्पीड़न और दहेज की मांग से संबंधित याचिका पर सुनवाई कर रहा था। न्यायमूर्ति जस्टिस अनिल कुमार-X ने सुनवाई के बाद अपने आदेश में कहा कि दहेज की मांग और उत्पीड़न के मामले में पति के परिवार के सभी सदस्यों के खिलाफ मुकदमा लिखने का प्रचलन हो गया है। इस प्रकार के कई मामलों में कोई ठोस आरोप नहीं होते हैं। जिससे कि पति के ससुराल के अन्य सदस्यों पर आरोप सिद्ध हो।

महिला पक्ष की तरफ से वकील ने दी दलील

महिला पक्ष की तरफ से सुनवाई में भाग लेते हुए वकील ने कहा कि गवाहों के बयान और आरोपों की पुष्टि होने के बाद भी आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। उन्हें तलब भी नहीं किया जा रहा है, जबकि उन्हें तलब करना न्यायसंगत है।

लड़के पक्ष की तरफ से वकील ने कहा

इसी क्रम में लड़के पक्ष की तरफ से वकील ने सुनवाई में भाग लेते हुए इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि बिना विशेष आरोप और सबूत के केवल सामान्य रूप में मुकदमा लिखना गलत है जबकि रिश्तेदारों के खिलाफ इस अपराध से कोई संबंध नहीं है। ‌

न्यायमूर्ति ने अपने आदेश में कहा

दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति अनिल कुमार- X ने कहा कि महिला पक्ष की तरफ से पति के परिवार के सभी सदस्यों को आरोपी बनाने की सामान्य प्रथा बन गई है। सास, ननद, और देवर के खिलाफ सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए गए हैं। बिना ठोस आधार वाले आरोप भरोसेमंद नहीं लगते हैं। ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत के फैसलों में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है, यह कहते हुए महिला की याचिका खारिज कर दी गई।