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सपा की सरकार बचाने को अतीक ने दी थी बड़ी कुर्बानी, पूर्व CM मुलायम सिंह यादव थे मेहरबान

2002 के विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला था। सपा 143 सीट जीती थी। सबसे अधिक सीटें सपा के पास ही थी। बसपा और भाजपा की बठबंधन वाली सरकार थी। एक साल बाद अतीक ने सपा की मदद की थी।

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अतीक अहमद और नेताजी के बीच बहुत अच्छा रिश्ता था। इस रिश्ते के पीछे मुलायम सिंह का मुस्लिम-यादव वोट बैंक की राजनीतिक समीकरण तो थी ही। साथ में अतीक अहमद का साल 2003 में त्याग भी था।

अतीक अहमद ने 3 अक्टूबर 2003 को 'अपना दल' का सपा में विलय करा दिया था। उस वक्त अतीक अहमद समेत सहित 3 विधायक थे।

सरकार बनाने में की थी मदद
उसी साल अगस्त में मुलायम सिंह यादव ने तीसरी यूपी के सीएम बने थे। बीजेपी-बसपा गठबंधन की मायावती की सरकार थी। अगस्त में बीजेपी का मायावती से मतभेद हो गया था। बीजेपी अपना समर्थन वापस ले ली थी। मायावती के कुछ विधायकों ने विद्रोह कर दिया था।मुलायम सिंह की सरकार को समर्थन दिया था। कुछ निर्दलीय विधायकों और अतीक अहमद के अपना दल के विधायकों ने भी मुलायम को सरकार बनाने में मदद की थी।


नेताजी ने पहली बार भेजा था संसद
साल 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा ने अतीक अहमद को फूलपुर से ‌टिकट दिया। अतीक अहमद चुनाव जीतकर पहली बार संसद पहुंचा। दिसंबर 2007 में राज्य में मायावती की सरकार बनी। राजू पाल मर्डर केस में शिकंजा कसा। सपा ने अतीक अहमद को पार्टी से निकाल दिया था।

चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनी थी सपा
2002 के विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं आया था। 143 सीटें जीतकर सपा सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। चुनाव बाद गठबंधन कर बीजेपी और बसपा ने सरकार बना ली थी। 98 सीटों वाली बसपा की नेता मायावती तब सीएम बनी थी और 88 सीट वाली बीजेपी ने उनका समर्थन किया था।