
चंद्रशेखर आजाद
इलाहाबाद. क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आजाद ने 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद की धरती पर जब ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों से अपने जीवन का अंतिम मोर्चा लिया तो अकेले ही उनके छक्के छुडा दिए। उन्होंने सांस टूटने से दो ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों को घायल कर दिया था। अंग्रेज पुलिस अधिकारियों में आजाद के अचूक निशाने का खौफ इस कदर समाया हुआ था कि ब्रिटिश पुलिस अधिकारी उनकी लाश के पास जाने से भी खौफ खा रहे थे।
23 जुलाई 1906 मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा गांव में जब सीताराम तिवारी के घर बच्चा जन्मा। नाम पड़ा चंद्रशेखर। उस समय किसी ने सोचा भी नहीं था कि सीताराम तिवारी का यह लल्ला चंद्रशेखर आने वाले सालों में देश की आजादी के लिए मिल का पत्थर साबित होगा। 14 साल की उम्र में अदालत से मिली 14 बेंतों की सजा ने उन्हें उपनाम आजाद दिया। चंद्रशेखर ने इतनी अल्प आयु में अदालत में जिन तीन शब्दों का अमर इतिहास लिखा।
आजाद शब्द उनमें से एक था। दरअसल देश से ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फंेकने के लिए महात्मा गांधी ने जो असहयोग आंदोलन चलाया था। गांधी की उस आंधी में विद्रोही व्यक्तित्व के इस बालक ने पढ़ाई छोड़ नए रास्ते की तलाश कर ली। 14 साल की छोटी उम्र में यह बच्चा साधारण कुर्ता ओर धोती पहने गलियों में भारत माता की जय, महात्मा गांधी की जय नारे लगा रहा था। अंग्रेज सिपाहियों को ये नागवार गुजरा। उन्होंने चंद्रशेखर को गिरफ्तार कर लिया।
मजिस्ट्रेट के सामने पेशी हुई। मजिस्ट्रेट ने बालक से नाम पूछा तो जवाब आया “आजाद”। पिता का नाम ? “स्वराज्य”। घर कहां है? जवाब मिला “जेलखाना”। चंद्रशेखर का जवाब सुन मजिस्ट्रेट भी आग बबूला हो गया। अल्प आयु होने के कारण चंद्रशेखर को जेल की बजाय 14 बेंत मारने की सजा सुनाई गई। मजिस्ट्रेट को दिए आजाद के तीन शब्दों के जबाव से देश के क्रंातिकारी काफी प्रभावित हुए। इसके बाद से ही चंद्रशेखर को चंद्रशेखर आजाद से पुकारा जाने लगा। जेल से छूटने के बाद बनारस में तो उनका भव्य स्वागत हुआ।
अंग्रेजों को मिली खुली चुनौती
चंद्रशेखर आजाद अब गांधी मार्ग छोड़ क्रांतिकारी बन अंग्रेजों से मोर्चा लेना शुरू कर दिया। आजाद के अदम्य साहस से कं्रातिकारी नेता रामप्रसाद बिस्मिल काफी प्रभावित हुए। उनके साहस को देखते हुए बिस्मिल ने काकोरी ट्रेन लूट कांड मंे आजाद को भी शामिल कर लिया। 9 अगस्त 1925 को खजाने से भरी ट्रेन को लूट कर ना केवल ऐतिहासिक घटना को अंजाम बल्कि ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती भी दी।
आजाद और कुंदनलाल को छोड़ रामप्रसाद बिस्मिल सहित अन्य साथी ब्रिटिश पुलिस के हाथो पकड़े गए। काकोरी कांड मामले में 19 दिसम्बर 1927 को रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला, रोशनसिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को अलग-अलग जेलों में फांसी दी गई। इस फांसी के बाद दल के गठन और उसके संचालन की जिम्मेदारी आजाद पर आ गई। आजाद को सर्वसम्मति से दल का कमांडर-इन-चीफ नियुक्त किया गया।
इसके बाद आजाद के नेतृत्व में इलाहाबाद, झांसी, आगरा , दिल्ली, ग्वालियर, लाहौर, कानपुर सहित कई अन्य शहरों में क्रांतिकारी गतिविधियों के केंद्र बनाए गए। जहां से अंग्रेजो के खिलाफ रणनीति तैयार की जाने लगी।
सांस टूटने से पहले दो ब्रिटिश पुलिसवालों को किया था घायल
चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद स्थित कटरा स्थित में एक साथी से मुलाकात कर सदरी की जेब में पिस्तौल डालते अल्फ्रेड पार्क की ओर चल दिए। अल्फ्रेड पार्क में उनकी मुलाकात क्रांतिकारी सुखदेव से हुई। दोनों पार्क में झाड़ियांे के बीच कुछ योजना बना ही रहे थे कि मुखबिर की सूचना पर ब्रिटिश पुलिस अधिकारी नाॅट बाबर और इंस्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह सहित अन्य पुलिसवाले उन पर फायरिंग करने लगे। उस दौरान पहली गोली उनके कान से छूती हुई निकल गई।
इसी बीच आजाद ने मोर्चा संभाल लिया। उन्होंने सुखदेव को वहां से निकलने को कहा तभी दूसरी गोली उनकी जांघ में आ लगी। गोली लगते ही चंद्रशेखर वहां लगे मौलश्री वृक्ष के पीछे से मोर्चा संभाल लिया। पुलिसवालों ने सुखदेव पर भी गोली चलाई लेकिन वो भागने में सफल रहे। इसके बाद पुलिस अधिकारी नाॅट बाबर आजाद को मारने के लिए दूसरी मैगजीन भरने लगा। तभी चंद्रशेखर आजाद ने नाॅट बाबर पर अपनी पिस्तौल से गोली मारी।
गोली लगते ही बाबर के हाथ से पिस्तौल छूट कर नीचे गिर पड़ी। इसके बाद इंस्पेक्टर विश्वेश्वर ने आजाद पर गोली चलाई तो आजाद ने इंस्पेक्टर विश्वेश्वर का जबड़ा गोली मार कर घायल कर दिया। आजाद की इस अचूक निशाने और जाबाजी के आगे ब्रिटिश पुलिसवाले आजाद की ओर बढ़ने से डरने लगे। आजाद अंग्रेजों की गोली से नहीं मरना चाहते थे। ऐसे में देश के वीर सपूत आजाद ने खुद को गोली मार ली।
इसके साथ ही आजाद के रक्त से इलाहाबाद की धरती लाल हो गई। आजाद के अचूक निशाने और सूझबूझ से ब्रिटिश पुलिसवाले इतने डरे हुए थे कि उनके मरने के बाद भी आजाद के पास जाने से डर रहे थे। ऐसे में उन्होंने आजाद के पैरों पर गोली चलवा कर मौत की पुष्टि की। चंद्रशेखर आजाद के शहीद होने के बाद ब्रिटिश पुलिस अधिकारी नाॅट बाबर ने खुद अपने बयान में ये बातंे कबूल की थी। नाॅट बाबर भी आजाद की हिम्मत से आश्चर्यचकित था।
लोगों ने आजाद के रक्त और मौलश्री वृक्ष पर बरसाया पुष्प
चंद्रशेखर आजाद की मौत इलाहाबाद सहित आसपास के जिलों में आग की तरह फैल गई। ब्रिटिश पुलिस ने आजाद की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। इस दौरान लोग चंद्रशेखर आजाद का जहां रक्त गिरा था। वहां फूलों की बारिश कर पूजा करने लगे। साथ ही अंतिम समय में कुछ देर तक जिस मौलश्री वृक्ष ने आजाद की जान बचाई थी। उसे भी लोग पूजने लगे। लोगों मंे आजाद के प्रति इतना सम्मान देख अंग्रेजी हुकूमत में जनता की एक जुटता का भय दिखने लगा। अंग्रेजों ने मौलश्री वृक्ष को ही कटवा दिया। आजाद की लाश जब लोगों को नहीं मिली तो लोगों ने पूरे शहर में आजाद की अस्थियांे का जुलूस निकाला।
इलाहाबाद संग्रहालय में रखी है आजाद की पिस्तौल
चंद्रशेखर आजाद के शहादत स्थल अल्फ्रेड पार्क का नाम बदल कर अब चंद्रशेखर आजाद पार्क रख दिया गया है। चंद्रशेखर आजाद की पिस्तौल कोल्ट आॅटोमेटिक केलिवर, 32, रिकलैस एंड स्मोकलेस और उनको लगी गोली भी इलाहाबाद संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है। जो कि केंद्र सरकार के अधीन है। इलाहाबाद आने वाले पर्यटकों के लिए आजाद पार्क और पिस्टल आकर्षण का केंद्र है।
प्रतिदिन यहां सैंकडो लोग आते हैं और उनकी समाधि पर पुष्प अर्पित करते हैं। आजाद के जन्म दिवस 23 जुलाई और शहीद दिवस 27 फरवरी के अलावा प्रत्येक 26 जनवरी गणतंत्र दिवस, 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस सहित अन्य राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति गीत के अलावा विभिन्न सास्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
Published on:
25 Jan 2018 09:55 am
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