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कहीं केस फर्जी तो नहीं? शंकराचार्य केस पर कोर्ट सख्त, अलग-अलग तारीखों पर उठे सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को पॉक्सो मामले में अग्रिम जमानत दी है और चार्जशीट तक गिरफ्तारी पर रोक लगाई है।

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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत | Image - X/@jyotirmathah

Shankaracharya Avimukteshwaranand Case Latest Update: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य को पॉक्सो एक्ट के मामले में अग्रिम जमानत दे दी है। कोर्ट ने चार्जशीट दाखिल होने तक उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। यह मामला नाबालिग बटुकों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। केस दर्ज कराने वाले आशुतोष महाराज पर कोर्ट में कई सवाल उठे हैं। कोर्ट ने केस की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

कोर्ट में उठे मुख्य सवाल

हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़ित बच्चों ने घटना की तारीख 18 जनवरी बताई, जबकि आशुतोष महाराज ने 24 जनवरी की तारीख बताई। दोनों तारीखों में 6 दिन का फर्क है। कोर्ट ने पूछा कि अगर 18 जनवरी को घटना हुई, तो आशुतोष महाराज 6 दिन बाद क्यों आए? उन्होंने जवाब दिया कि वे यज्ञ और पूजा में व्यस्त थे। कोर्ट ने इसे सही जवाब नहीं माना और कहा कि ऐसी गंभीर घटना पर तुरंत आना चाहिए था।

पीड़ित बच्चों ने पहले आशुतोष महाराज को क्यों बताया?

कोर्ट ने सबसे अहम सवाल यह उठाया कि किसी बच्चे के साथ कोई बुरी घटना हो तो वह सबसे पहले अपने मां-बाप या परिवार को बताता है। लेकिन यहां बटुक आशुतोष महाराज को पहले से नहीं जानते थे। फिर भी उन्होंने सबसे पहले उन्हीं को घटना बताई। आशुतोष महाराज ने दावा किया कि बच्चे उनके पास भागकर आए। कोर्ट ने कहा कि यह बात मानवीय स्वभाव के खिलाफ है। पीड़ित बच्चा अजनबी व्यक्ति को पहले दर्द नहीं बताता। ऐसे में पूरे केस और FIR को सावधानी से जांचना जरूरी है। कोर्ट ने संकेत दिया कि कहीं यह झूठा केस तो नहीं है।

बटुक कहां पढ़ते थे?

आशुतोष महाराज ने दावा किया था कि दोनों पीड़ित बटुक शंकराचार्य के आश्रम में रहकर पढ़ते थे और वहां कुकर्म हुआ। लेकिन जांच में सामने आया कि दोनों बच्चे हरदोई के संस्कृत स्कूल में पढ़ाई करते थे। आश्रम से उनका कोई सीधा संबंध नहीं था। इस बात ने भी कोर्ट के सामने सवाल खड़े किए।

मेडिकल रिपोर्ट क्या कहती है?

मेडिकल जांच रिपोर्ट में डॉक्टरों ने लिखा कि बच्चों के प्राइवेट पार्ट पर कोई बाहरी चोट नहीं मिली। हालांकि, यौन उत्पीड़न या उत्पीड़न को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। डॉक्टरों ने सलाह दी कि FSL जांच (फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी) कराई जाए।

कोर्ट का फैसला क्यों महत्वपूर्ण?

कोर्ट ने कहा कि बच्चों को सही कस्टडी में क्यों नहीं लिया गया, इस पर भी सवाल है। पूरे मामले में कई कमियां और विरोधाभास दिख रहे हैं। इसलिए कोर्ट ने शंकराचार्य को अग्रिम जमानत देते हुए कहा कि चार्जशीट आने तक उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। साथ ही, जांच में सहयोग करने के निर्देश दिए गए हैं। यह फैसला धार्मिक और संवेदनशील मामले में काफी चर्चा में है। कोर्ट ने साफ किया कि बिना ठोस सबूत के किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आशुतोष महाराज द्वारा लगाए गए आरोपों की सच्चाई अब पुलिस जांच से सामने आएगी।

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