
इलाहाबाद. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने महाराजगंज जिले में 1992 में बिना विधिक प्रक्रिया अपनाये 22 कर्मचारियों की मनमानी नियुक्ति करने वाले जिला विकास अधिकारी के वारिसों को बड़ी राहत दी है। जज की एकलपीठ ने जिलाधिकारी द्वारा नियुक्तियों को निरस्त करने के आदेश को वैध करार देते हुए कर्मचारियों की याचिकाएं खारिज कर दी थी। किन्तु उन्हें सेवा में कार्यरत रखने व नियमित वेतन देने का आदेश दिया था और कहा था कि उन्हें सेवाजनित अन्य कोई लाभ नहीं मिलेगा। साथ ही डीडीओ पर 21 लाख रूपये का हर्जाना लगाते हुए उसकी अर्जित सम्पत्ति से वसूली का आदेश दिया था।
खण्डपीठ ने कहा कि डीडीओ याचिका में पक्षकार नहीं था और मरने के बाद उसका पक्ष सुने बगैर उसकी सम्पत्ति से हर्जाना वसूली आदेश देना सही नहीं है। कोर्ट ने डीडीओ की पत्नी की अपील तथा राज्य सरकार की अपील मंजूर कर ली है और कर्मचारियों की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि डीडीओ के नियुक्ति आदेश को अवैध करार देकर जिलाधिकारी द्वारा निरस्त करने का आदेश सही है। याचियों को सेवा में बने रहने का अधिकार नहीं है। एकलपीठ ने याचिकाएं खारिज करते हुए कर्मचारियों को वेतन देने व कार्यरत रहने का आदेश देकर जो राहत दिया उसे सही नहीं माना जा सकता।
यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति अजित कुमार की खण्डपीठ ने ड्राइवर दया शंकर उपाध्याय व अन्य कई अपीलों पर दिया है। डीडीओ ने बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाये दैनिक वेतन पर कर्मियों की नियुक्ति कर ली। जिलाधिकारी ने 16 जनवरी 1992 के आदेश से नियुक्तियां निरस्त कर दी। जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी। कोर्ट ने जिलाधिकारी के आदेश पर रोक लगा दी थी। बाद में न्यायमूर्ति एस.यू खान ने याचिकाएं खारिज करते हुए जिलाधिकारी के आदेश को वैध करार दिया। किन्तु कर्मियों को सेवा में बने रहने व वेतन पाने का हकदार माना और कहा उन्हें प्रोन्नति नहीं मिलेगी। जो प्रोन्नत हैं, वापस होंगे, भत्ते इंक्रीमेंट नहीं मिलेगा। सेवा निवृत्ति परिलाभ नहीं मिलेगा। इसे राज्य सरकार व डीडीओ के वारिसों तथा याचियों ने चुनौती दी। कोर्ट ने कहा था कि डीडीओ शिवराज भट्ट की मौत हो गयी है तो उसकी सम्पत्ति से वसूली की जाय। कोर्ट ने डीडीओ को राहत देते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दी।
Published on:
13 Dec 2017 09:34 pm
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