विनोद चंद्र दुबे को समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने महापौर प्रत्याशी बनाया।समाजवादी नेताओं के अलावा शहरी लोगों में भी एक सही प्रत्याशी के चयन का उत्साह था। लेकिन परिणाम इस कदर आया कि समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी की जमानत भी नहीं बच सकी।बिनोद चंद दुबे अपने हर चुनावी मंच से यह कहना नहीं भूलते थे,कि मेरा आखिरी चुनाव है।मेरा समर्थन कीजिए मैं शहर का विकास करना चाहता हूं।इस मिट्टी का कर्ज है मुझ पर उसको चुकाना चाहता हूं। विनोद चंद्र दुबे के जातीय समीकरण और उनका लोगो के लोकप्रिय होना सपा के लिए प्लस था।समाजवादी पार्टी का अपना जातिगत वोट के अलावा विनोद चंद्र के ब्राह्मण होने से यह माना जा रहा था।कि प्रत्याशी कोई भी होगा,लेकिन टक्कर कांटे की होगी।लेकिन बीच में ही भारतीय जनता पार्टी के बागी विजय मिश्रा ने कांग्रेस का दामन थाम कर ब्राह्मण प्रत्याशी होने का समाजवादी पार्टी का समीकरण बिगाड़ दिया। वोटरों का एक बड़ा तबका यह अंदाज़ा नही लगा पाया।की किसका पलड़ा भारी है।