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Nag Panchami Special: शिव के गले से उतर कर प्रयागराज के इस मंदिर में विश्राम करते हैं नागराज, आज के दिन देते है दर्शन

Nag Panchami Special: सावन के पावन सोमवार के ही दिन नागपंचमी (Nag Panchami) का पड़ना एक अद्भुत संयोग है। जैसा कि ज्ञात है आज के दिन नाग देवता की पूजा कि जाती है और यह पूजा अगर संगम नगरी प्रयागराज (Prayagraj) में की जा रही हो तो इसका विशेष फल मिलता है। प्रयागराज के नागवासुकी मंदिर (Naag Vasuki Temple) की नागपंचमी से जुड़ी हुई क्या है पौराणिक कथा, आइये जानते हैं।

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नागवासुकी मंदिर प्रयागराज

Nag Panchami Special: संपूर्ण भारत में नागपंचमी (Nag Panchami) 21 अगस्त को मनाई जा रही है। सनातन परंपरा में हर विशेष दिन का अपना अध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। नागपंचमी सावन की पंचमी तिथि को पड़ती है। इस कारण यह और विशेष हो जाती है। नागपंचमी के दिन श्रद्धालु नाग देवता की पूजा करते हैं। उन्हें दूध पिलाते हैं। दूध और मखाने का प्रसाद चढ़ाया जाता है। ऐसी अद्भुत संस्कृति केवल भारत में ही देखने को मिलती है। नागपंचमी के इस विशेष अवसर पर हम आपको उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (Prayagraj) जिलें में स्थित नागवासुकी मंदिर (Naag Vasuki Temple) की मान्यता और महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं। हम यह भी जानेंगे कि नागपंचमी पर यहां दर्शन पूजन क्यों विशेष है?


संगम से चंद मीटर की दूरी पर है स्थित


नागवासुकी का यह विश्वप्रसिद्ध मंदिर, उत्तर प्रदेश में प्रयागराज जिलें में स्थित है। प्रयागराज के दारागंज के उत्तरी-पूर्वी छोर पर गंगा नदी के किनारे स्थित है। यह अतिप्राचीन मंदिर संगम से लगभग 500 मीटर की दूरी पर है। मंदिर प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अलौकिक उर्जा से भरा हुआ है। साल भर यहां पर देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। लेकिन कुंभ, सावन और विशेष रुप से नागपंचमी पर यहां भक्तों का ताता लगा रहता है।

यह है पौराणिक मान्यता


पौराणिक मान्यता के अनुसार इस मंदिर की स्थापना हजारों साल पहले ब्रह्मा के मानस पुत्र द्वारा की गई थी। मंदिर का वर्णन पुराणों में भी है। कथाओं के अनुसार जब समुद्र मंथन किया गया तब नागवासुकी को मंदरांचल पर्वत से रस्सी की तरह बांधकर देवताओं और असुरो ने मंथन किया। मंथन के दौरान वासुकी नाग का शरीर मंदरांचल पर्वत से छिल गया, जिसकी वजह से वह घायल हो गए।

उनकी यह दशा देख भगवान विष्णु ने उन्हें प्रयागराज जाने को कहा और वहां सरस्वती नदी में स्नान कर के आराम करने की सलाह दी। त्रीलोकी नाथ भगवान विष्णु के कहने पर वह प्रयागराज में आकर दारागंज के उत्तरी-पूर्वी छोर पर रहने लगे।

प्रयागराज में रुकने के लिए रखी थी शर्त


प्रयागराज में नागवासुकी के रहने के दौरान वाराणसी के दिवोदास जी महाराज ने 60 हजार साल इन्हें प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। जब नागवासुकी पूरी तरह से स्वस्थ होने के बाद यहां से जाने लगे तो देवताओं ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। देवताओं की विनती करने पर प्रयाग में रुकने के लिये वासुकी नाग ने उनके सामने दो शर्तें रखी। उन्होंने कहा की मैं यहां तभी रुकूंगा जब प्रयाग स्नान को आने वाले श्रद्धालुओं का मेरा दर्शन करना अनिवार्य होगा और सावन के पंचमी को तीनों लोको में मेरी पूजा होगी।

देवताओं ने इनकी शर्त मान ली। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र द्वारा इनकी स्थापना की प्रयागराज के दारागंज में गंगा किनारे की गई।


मंंदिर में आते हैं वासुकी नाग


यहां के पुजारियों की ऐसी मान्यता है कि नागवासुकी मंदिर के गर्भगृह में आते हैं। मंदिर में रोज आरती करने के बाद उनके लिए बिस्तर लगाया जाता है। सुबह जब कपाट खोले जाते हैं तो बिस्तर अस्त व्यस्त रहता है। मान्यता के अनुसार प्रतिदिन नागवासुकी यहां आराम करने आते हैं।

नागपंचमी पर है दर्शन का विशेष लाभ


मंदिर में साल भर में केवल एक बार नागपंचमी के दिन ही भगवान नागवासुकी का अभिषेक करने की अनुमति है। मात्र इस दिन ही उनका विशेष प्रसाद धान का लावा और दूध यहां चढ़ाया जाता है। साल के बाकि दिनों में केवल दर्शन कर सकते हैं।


वहां के पुजारियों का कहना है कि नागपंचमी के दिन दर्शन-पूजन करने पर कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है और हर प्रकार के दोषों से मुक्ति मिल जाती है। बस इसके लिए आपका भाव शुद्ध रहना चाहिए और भगवान नागवासुकी पर पूर्ण विश्वास हो।


कालसर्प दोष से मिलती है मुक्ति


मान्यताओं के अनुसार भगवान नागवासुकी के दर्शन करने मात्र से ही कुंडली के कालसर्प दोष से मुक्ति मिल जाती है। भगवान नागवासुकी को प्रसन्न करने के लिए लोग यहां तांत्रिक और वैदिक अनुष्ठान करवाते हैं।


इस प्रकार प्रयागराज में स्थित इस मंदिर की यह मान्यता है कि कुंभ स्नान का फल बिना नागवासुकी के दर्शन के नहीं मिलता। यह स्नान अधूरा माना जाता है। इसलिए संगम स्नान करने वाला हर श्रद्धालु यहां दर्शन करने जरुर आता है। मंदिर के परिसर में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को असीम शांति का अनुभव होता है। जो उन्हें एक अलौकिक अनुभूती देता है।