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एमएनआईटी में इंजीनियरिंग के छात्रो को पढना होगा ,संविधान और संस्कृत का पाठ

बीटेक एमटेक और एमबीए के विद्यार्थियों को एच्छिक विषय के तौर पर चुनना होगा

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Now Sanskrit and Constitution will be taught in MNIT

एमएनआईटी पढाए जाएंगे संस्कृत और सविधान

इलहाबाद मोतीलाल नेहरु प्रद्योगिकी संस्थान ने अब नई पहल की है। अभी तक टेक्नोलॉजी की अलग अलग विधाओं में महारथ हासिल करने वाले इंजीनियरिंग के विद्यार्थी मात्र तकनिकी अध्ययन करते थे। अब उन्हें टेक्नीशियनो संस्कृत और संविधान में पढ़ाया जाएगा एमएनआईटी के बीटेक एमटेक और एमबीए करने वाले विद्यार्थियों को आगामी शैक्षिक सत्र से ऐच्छिक विषय के तौर पर संस्कृत और भारतीय संविधान की भी पढ़ाई कराए जाने का खाका तैयार है। जिसकी पढाई आगामी शैक्षिक सत्र से प्रारंभ किया जाएगा। एमएनआईटी के निदेशक प्रोफेसर राजीव त्रिपाठी के अनुसार भावी इंजीनियरों को अब टेक्निकल पढ़ाई के साथ संस्कृत और संविधान भी पढ़ाया जाएगा। उसके लिए विशेषज्ञों की मदद से इन दोनों विषयों का पाठ्यक्रम तैयार लगभग पूरा कर लिया गया है जल्द ही इस का अंतिम रुप दिया जाएगा।

पाठ्यक्रम तैयार होने के बाद एमएनआईटी प्रशासन मंजूरी के लिए इसे संस्थान में शैक्षिक मामलों की सर्वोच्च निर्णायक संस्था सीनेट के सामने पेश करेगी। प्रोफेसर त्रिपाठी के अनुसार संविधान का पाठ्यक्रम इलाहाबाद विश्वविद्यालय की विधि संकाय और संस्कृत का पाठ्यक्रम गंगानाथ झा राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के विशेषज्ञों की मदद से तैयार किया जा रहा है।पाठ्यक्रम इस प्रकार बनाया जा रहा है, कि उसमें तकनीकी और प्रबंधन का भी समावेश हो सके संस्कृत भाषा को तकनीकी और प्रबंधन से जोड़ते हुए पाठ्यक्रम तैयार करने की योजना लगभग पूरी हो चुकी है। सेमेस्टर सिस्टम के तहत बी टेक एम टेक और एमबीए के विद्यार्थियों को एक एच्छिक तौर पर पेपर चुनने की छूट दी जाएगी।

बता दें कि अभी सप्ताह भर पूर्व मोतीलाल नेहरु प्रतियोगी संस्थान ने अपना 14 वां दीक्षांत समारोह मनाया है। जिसमें बतौर मुख्य अतिथि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शिरकत की महामहिम राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में एमएनआईटी प्रशासन और यहां के छात्रों से यह अपील की थी।की भावी इंजीनियर्स केवल टेक्निकल ही न हो ।अपने राष्ट्र के प्रति सजग रहे, और अपनी परंपराओं को भी जाने।राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा था कि अध्ययन और अध्यापन सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए कि जीवन में स्वयं का जीविकोपार्जन किया जा सके। बल्कि जिस राष्ट्र ने हमें बहुत कुछ दिया है। हम उसे भी कुछ दे सके इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहे।

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