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गजब! प्रयागराज के फूलपुर कोतवाली में रखा 7 क्विंटल 80 किलो गांजा पी गई पुलिस, कोर्ट ने दिए एफआईआर के आदेश

UP News: यूपी के प्रयागराज की क्राइम ब्रांच और फूलपुर पुलिस ने 10 साल पहले चार अंतरराज्यीय तस्करों से 7 क्विंटल 80 किलो गांजा बरामद दिखाकर अपनी पीठ तो थपथपाई, लेकिन कोर्ट में यह कहानी औंधे मुंह गिर पड़ी। कोर्ट ने मामले में दोषी पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज कराने के आदेश दिए हैं। आइए जानते हैं पूरा मामला...

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Court (File Photo)

NDPS Court Action Against Police: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित एनडीपीएस कोर्ट में पुलिस मुकदमे में आरोपी चार गांजा तस्करों पर आरोप साबित करने में नाकाम रही। इसपर कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाते हुए दोषी पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज कराने के आदेश दिए हैं। मामला 10 साल का है। फूलपुर थाने के तत्कालीन प्रभारी कुशल पाल यादव और क्राइम ब्रांच के प्रभारी ओम शंकर शुक्ला की टीम ने 20 अप्रैल 2014 को सरैया तिराहे से मिनी ट्रक और ऑल्टो कार से 7 क्विंटल 80 किलो गांजा बरामद करने का दावा किया था। पुलिस ने इस दौरान चार अंतरराज्यीय गांजा तस्करों को भी गिरफ्तार किया था। इनकी पहचान बहरिया मुबारकपुर निवासी अशोक जायसवाल और दीपक जायसवाल, मुट्ठीगंज के रमाकांत विश्वकर्मा और मिर्जापुर जिले के तिलाई निवासी तेजधर मिश्रा के रूप में कराई गई। इस दौरान दो आरोपी फरार हो गए थे। इनकी पहचान कांस्टेबल गुलाम शबीर ने विपिन जायसवाल और त्रिशूल चंद्र के रूप में की थी।


क्राइम ब्रांच और फूलपुर पुलिस ने 10 साल पहले अंतरराज्यीय चार तस्करों से सात क्विंटल 80 किलो गांजा बरामद दिखाकर अपनी पीठ तो खूब थपथपाई, लेकिन कोर्ट में यह कहानी औंधे मुंह गिरी। कोर्ट में सबूत पेश करते समय पुलिस न तो गांजा दिखा सकी न ही जिस वाहन पर गांजा ले जाया जा रहा था वह वाहन ही पेश कर सकी। पुलिस का कहना था कि गांजा थाने में ही सड़ गया। दूसरी ओर इस मामले में सीओ समेत 11 गवाहों में से सिर्फ एक की गवाही हो पाई। पुलिस वह ट्रक, कार और स्कूटी भी नहीं दिखा पाई। जिससे तस्करी का दावा था।

इसके बाद कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए मामले में दोषी पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज कर कड़ी कार्रवाई करने का आदेश दिया। साथ ही चारों आरोपियों को बरी कर दिया। इस दौरान एनडीपीएस कोर्ट ने कहा कि मौजूदा हालात में इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस मामले में पुलिस द्वारा अभियुक्तों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। यह हैरानी की बात है कि बरामद सात क्विंटल 80 किलो गांजा में से एक ग्राम भी कोर्ट में पेश नहीं किया जा सका।


पुलिस की ओर से दरोगा गजानंद चौबे ने चारों आरोपियों के खिलाफ नार्कोटिक्स एक्ट की धाराओं में आरोप पत्र दाखिल किया। इसमें बताया गया कि सीओ अलका धर्मराज के समक्ष आरोपियों की तलाशी ली गई। इस दौरान सात क्विंटल 80 किलो गांजा बरामद हुआ था। 10 साल चले मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष तत्कालीन सीओ, क्राइम ब्रांच के प्रभारी, विवेचक समेत 11 गवाहों में से सिर्फ मुकदमा लिखाने वाले कुशल पाल यादव को ही पेश कर सका। बतौर सुबूत फर्द बरामदगी पेश की गई।

दूसरी ओर, अभियोजन की ओर से पेश एकमात्र गवाह तत्कालीन प्रभारी निरीक्षक कुशल पाल यादव की गवाही में भी ढेरों छेद थे। गवाही में बताया कि गांजे की तौल कांस्टेबल जितेंद्र कुमार द्वारा लाई गई तराजू से की गई थी, लेकिन जिरह में वह यह नहीं बता सके कि तराजू आई कहां से थी, वह तराजू अब कहां है। वारदात के दौरान बरामद मिनी ट्रक, ऑल्टो कार और स्कूटी किसकी थी और ये वाहन कहां हैं, इसका भी वह कोई जवाब नहीं दे सके।


एनडीपीएस कोर्ट के विशेष न्यायाधीश भारत सिंह यादव की कोर्ट ने पुलिस आयुक्त प्रयागराज को पत्र लिख कर सुबूत पेश करने को कहा, लेकिन पांच महीने में कोई जवाब नहीं मिला। इसके पहले कोर्ट को बताया गया कि बरामद गांजा मालखाने में रखरखाव के समुचित इंतजाम न होने के कारण सड़कर नष्ट हो गया है। कोर्ट ने सुबूतों-गवाहों के अभाव में चार आरोपियों को बरी कर दिया। जबकि दो आरोपी अभी भी फरार हैं। कोर्ट ने अब दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के साथ ही विभागीय जांच कर कड़ी कार्रवाई करने का आदेश दिया है।