
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक व्याख्यता पर की टिप्पणी, याचिकाओं के निस्तारण में लंबा समय लगे तो यह है अधूरा
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक व्याख्यता पर सवाल उठाते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने मथुरा के कोतवाली थाने में भ्रष्टाचार के आरोप में दर्ज प्राथमिकी के मामले में दाखिल याचिका पर ल न्यायिक व्यवस्था पर अहम टिप्पणी की है। सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा है कि न्यायिक सेवा के साथ कानूनी सेवा एक मिशन है। यह सामान्य सेवाओं से इतर है। वाद के निस्तारण में यदि वादी को लंबा इंतजार करना पड़े या उसका निस्तारण न हो सके तो यह मिशन अधूरा है। इसीलिए व्यवस्था सुचारू चलनी चाहिए।
मथुरा कोर्ट को दिया निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि हिरासत में रखे गए व्यक्ति के विचाराधीन मामलों का निर्णय जल्द करना न्यायालयों की प्राथमिकता में है और उसमें देरी होना एक बाधा है। मिशन की सफलता तक अदालत के पीठासीन अधिकारी आराम नहीं कर सकते हैं। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा हुसैन सहित कई अन्य मामलों का हवाला देते हुए याचिका के जल्दी निस्तारण के लिए जिला अदालत मथुरा को निर्देशित किया।
एक सफ्ताह में ले फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वह याची की जमानत अर्जी पर एक सप्ताह में फैसला लेना चाहिए। साथ ही मजिस्ट्रियल परीक्षण को छह महीने में और सत्र परीक्षण दो साल में पूरा करने को कहा है। इसके साथ ही याची के खिलाफ 45 दिनों तक दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी।
मामले में सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी ने लाडली प्रसाद की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि उसके द्वारा वाद के निस्तारण के लिए दी गई समय सीमा न्यायिक अधिकारियों के न्यायिक प्रदर्शन के आकलन के लिए एक कसौटी भी हो सकती है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याची की 45 दिनों की दी गई राहत को आगे बढ़ाने पर विचार नहीं किया जाएगा।
Published on:
30 May 2022, 2:26 PM IST
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