
नागा साधु
आलोक पण्ड्या
प्रयागराज. कुंभ मेले में आए हैं तो आते यहां मौजूद बाबाओं को उनके बालों को रखने के तरीके से भी यह पता लगा सकते हैं कि यह बाबा किस भगवान का भक्त है। प्रयाग में संगम की रेती पर कोई जटाधारी धूनी रमा कर बैठा है तो कोई लंबी शिखा के साथ हवन कर रहा है। बालों को साधुओं के श्रृंगार का एक अहम हिस्सा माना जाता है और कुंभ के मेले में बाबा अपने-अपने अखाड़ों के रिवाज के मुताबिक बालों का श्रृंगार करके घूमते हैं।
शैव साधु रखते हैं जटा तो वैष्णव की निशानी है शिखा
शिव की उपासना करने वाले शैव मत के बाबा जटाएं रखते हैं तो वैष्णव मत के रामानुज संप्रदाय को मानने वाले साधु पूरे सिर पर शिखा रखते हैं। इसके साथ ही वैष्णव साधु और देवी के उपासक गंजा सिर रहते हैं। महानिर्वाणी अखाड़े के अवध पुरी महाराज के मुताबिक आध्यात्म की भाषा में इन बाबाओं को भद्र कहा जाता है। ब्रह्मचारियों को सिर बीचों बीच गाय के खुर के समान शिखा रखना आवश्यक है। लक्ष्मी के उपासक बाबाओं को आप उनके खुले बालों से पहचान सकते हैं।
रूद्राक्ष और भस्म से होता है श्रृंगार
शैव मत के नागा साधु अपने सिर पर बड़ी-बड़ी जटाएं रखते हैं। कुछ बाबाओं की जटाएं तो उनके कद से भी ज्यादा लंबी हैं। बाबा अपनी जटाओं को रूद्राक्ष की मालाओं, भस्म और मोतियों से भी सजाते हैं। कुंभ में एक ही अखाड़े में अलग-अलग स्थानों से साधु पहुंचते हैंं। ऐसे में जटाओं के जरिए खुद को अलग दिखाने की साधुओं में होड़ रहती है।
बरगद के दूध से बनती है जटा
बाबा अपने बालों को जटा में तब्दील करने के लिए अच्छे खासे जतन करते हैं। जटा बनाने के लिए बालों को खुला छोड़ दिया जाता है और उनमे कंघी नहीं की जाती है। ऐसे में बाल आपस में चिपक कर रस्सियों की तरह गुथने लगते हैं। जटा बनाने के लिए बरगद के दूध का इस्तेमाल भी किया जाता है। जटाओं को सिर्फ काली या मुल्तानी मिट्टी से धोया जाता है। कुछ साधु धोने के साथ ही जटाओं को बड़ा बनाने के लिए भस्म का उपयोग करते हैं।
जीवन में सिर्फ एक बार कटवाते हैं बाल
लंबे बालों वाले साधु दशानन जटल संन्यासी कहलाते हैं। और ये जीवन पर्यंत अपने बाल नहीं कटवाते हैं। सिर्फ अपने गुरू के निधन पर ही बाल कटवाते हैं।
Published on:
11 Feb 2019 07:17 pm
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