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SIR ड्राफ्ट से भाजपा के शहरी गढ़ हिले, जहां जीत थी, वहीं सबसे ज्यादा वोट कटे

यूपी में SIR की ड्राफ्ट लिस्ट जारी हो गई है। प्रदेशभर में करीब 2.89 करोड़ नाम मतदाता ड्राफ्ट सूची से बाहर हो गए हैं। पिछले विधानसभा चुनावों के आंकड़ों से तुलना करें तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है। जिन जिलों में सबसे ज्यादा वोट कटे, वहां 2022 में भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिली थी। अब उन्हीं क्षेत्रों में मतदाता आधार घटने से चुनावी गणित बदल सकता है।

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SIR up

उत्तर प्रदेश में Special Intensive Revision (SIR) की ड्राफ्ट मतदाता सूची ने सियासी गलियारों में खलबली मचा दी है। प्रदेशभर में करीब 2.89 करोड़ नाम, यानी लगभग 18 फीसदी मतदाता, ड्राफ्ट सूची से बाहर हो गए हैं। सबसे बड़ा झटका शहरी और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली जिलों में देखने को मिला है, जहां अब तक मजबूत माने जाने वाले वोट बैंक अचानक सिकुड़ते नजर आ रहे हैं।

राजधानी लखनऊ में स्थिति सबसे चौंकाने वाली है। यहां मतदाताओं की संख्या में करीब 30 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। पहले जहां 39.94 लाख वोटर थे, वहीं अब यह आंकड़ा 27.94 लाख के आसपास सिमट गया है। यानी करीब 12 लाख नाम ड्राफ्ट से बाहर हो गए। इसके बाद गाजियाबाद में 28.83%, बलरामपुर में 25.98%, कानपुर नगर में 25.50% और मेरठ में 24.66% नाम कटे। प्रयागराज में 24.64%, गौतमबुद्धनगर में 23.98%, आगरा में 23.25%, शाहजहांपुर में 21.76% और बरेली में 20.99% मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। यह वही शहरी इलाके हैं, जो पिछले चुनावों में सत्तारूढ़ दल का मजबूत आधार माने जाते रहे हैं।

बीजेपी के गढ़ वाले 10 जिलों पर असर

इन 10 जिलों में विधानसभा की कुल 74 सीटें आती हैं। 2022 के चुनाव में भाजपा ने इनमें से 58 सीटों पर बड़ी जीत दर्ज की थी। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि आगरा गाजियाबाद और नोएडा जैसे शहरी इलाकों में जहां भाजपा का मजबूत आधार माना जाता है वहां वोटरों की संख्या कम होना पार्टी के लिए नई चुनौती बन सकता है।

मुस्लिम बहुल जिलों की स्थिति

दूसरी ओर, मुस्लिम बहुल जिलों में भी 15 से 20 फीसदी तक मतदाता कम हुए हैं। सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, रामपुर और संभल, जहां मुस्लिम मतदाता 40 से 50 प्रतिशत तक हैं, वहां भी 15 से 20 प्रतिशत तक नाम कटे हैं। मुरादाबाद में 15.76%, सहारनपुर में 16.37%, मुजफ्फरनगर में 16.29%, जबकि रामपुर और संभल में 18.29 प्रतिशत मतदाता कम हुए हैं।

इन जिलों में कुल 28 विधानसभा सीटें हैं, जहां 2022 में NDA को 11 और सपा गठबंधन को 17 सीटें मिली थीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मतदाता कटौती समान रूप से सभी समुदायों में हुई है, तो विपक्ष के लिए मुस्लिम वोटों का शत-प्रतिशत ध्रुवीकरण और भी जरूरी हो जाएगा। वहीं NDA के लिए सहयोगी दलों के साथ अंकगणित साधना एक कठिन काम हो है।

धार्मिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिले

SIR ड्राफ्ट के बाद सबसे ज्यादा निगाहें अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज, मथुरा और गोरखपुर जैसे धार्मिक और राजनीतिक रूप से अहम जिलों पर टिकी हैं। प्रयागराज में सबसे अधिक 24.64 प्रतिशत मतदाता कम हुए हैं। 46.92 लाख से घटकर मतदाता संख्या 35.36 लाख पर आ गई। 2022 के विधानसभा चुनाव में जहां NDA ने यहां 12 में से 8 सीटें जीती थीं, वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को झटका दिया। ऐसे में मतदाता आधार का यह संकुचन आने वाले चुनावों की रणनीति को प्रभावित कर सकता है।

अयोध्या में 17.69 प्रतिशत मतदाता घटे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद यह जिला पहले ही राजनीतिक बहस के केंद्र में है। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी 18.18 प्रतिशत नाम कटे हैं, जबकि मथुरा में 19.20 प्रतिशत और गोरखपुर में 17.61 प्रतिशत मतदाता कम हुए हैं। ये वही जिले हैं जहां हालिया वर्षों में भारतीय जनता पार्टी का दबदबा रहा है।

शहरी आबादी और पैतृक निवास का तर्क

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े शहरों में रहने वाले लोगों ने एसआईआर के कारण पहली बार अपने शहर की जगह पैतृक गांव को वोटर लिस्ट के लिए चुना है। यही कारण है कि नोएडा कानपुर और बरेली जैसे विकसित शहरों में वोटरों की संख्या में भारी गिरावट आई है।


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