
छिना दो हजार लोगों का रोजगार सोलह सौ करोड़ की भवानी पेपर मिल्स गिन रही है आखिरी दिन
रायबरेली । कांग्रेस के गढ़ में रोजगार के लिये आज पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रायबरेली जनपद एवं इसके आसपास के जनपदों के लोगों के लिये यहां रोजगार का एक महाकुम्भ तैयार किया था। उस समय लगभग 35 फैक्ट्री होने की बात जनपद की जनता बता रही है। लेकिन आज का दौर अगर देखा जाये तो यहां पर रोजगार के लिये रायबरेली एवं आसपास के जिलों के युवा मजदूरी करने को मजबूर है साथ ही दूसरे प्रदेशों में काम की तलाश में जा रहे है।
1979 का दौर था पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कर कमलों द्वारा जनपद के मिल एरिया क्षेत्र में अत्याधुनिक पेपर मिल लगाई गई यह भरोसा था कंपनी लगभग इन हजार लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार देगी। समय के साथ नौकरशाही व प्रशासन के शिथिल रवैए के चलते 2014 में पेपर मिल्स बंद हो गई उसी के साथ छिन गया 2000 लोगों का रोजगार जो अन्य प्रदेशों के साथ साथ रायबरेली के लोग यहां काम किया करते थे आज उनकी रोजी-रोटी चलने को लाले पड़े हैं। पत्रिका संवाददाता से बात करते समय कंपनी के सीओओ रिटायर्ड कर्नल डीजे कुशवाहा का दर्द छलका उन्होंने बताया कंपनी के मालिकों ने बैंक से रिकंस्ट्रक्शन लोन लेने के लिए कई बार निवेदन किया लेकिन इस निवेदन को राजनीति में घसीट कर लोन देने के लिए कोई भी राजी नहीं हुआ जिसके चलते कंपनी अभी भी चालू हालात में है यदि उसमें प्रत्यक्ष रूप से लगभग 100 करोड़ का निवेश कर दिया जाए तो एक बार कंपनी चालू हो सकती है। यही नहीं उन्होंने कहा आज भी कंपनी के कर्मचारी कंपनी की सुरक्षा के साथ साथ मशीनरी का पूरा ख्याल रखते हैं इस उम्मीद में कभी ना कभी वह दिन आएगा जब ये कंपनी चालू होगी उन्हें रोजगार मिलेगा और वह अपना परिवार कुशल तरीके से चला सकेंगे। पत्रिका संवाददाता ने सीईओ बीके कुशवाहा से कई सवाल किए आखिर किन हालातों में कंपनी बंद होने के कगार पर चली गई सभी प्रश्नों का जवाब सीओओ ने दिए।
भवानी पेपर मिल की शुरुआत टंडन बंधुओं ने की थी
आपको पहले यह बता दे भवानी पेपर मिल की शुरुआत टंडन बंधुओं ने रखी थी क्योंकि इलाहाबाद के रहने वाले हैं। शुरुआत में यहां पर दो मशीनें लगाई गई थी जिनकी क्षमता 50 टन प्रति दिन की थी। इस फैक्ट्री में कलर लेजर टिशु क्राफ्ट पेपर का निर्माण होता था। 5 साल से उत्पादन बंद होने के कारण इस समय फैक्ट्री एनसीएलटी में चली गई है जहां पर कंपनी को 282 दिन का समय मिला था। कंपनी में पैसा लगाने को लेकर बैंक आनाकानी कर रही है इसमें अब देखना यह होगा क्या फैक्ट्री का रिजल्ट होगा या फिर एक बिट लगाकर कंपनी नीलाम कर दी जाएगी।
मजदूरों को सरकार के मदद की आशा की उम्मीद
सीओओ कुशवाहा कहते हैं फैक्ट्री में काम करने वाले कारीगरों के प्रति हमारी सहानुभूति है हम हर जरूरी कदम उठा रहे हैं कि उनका बकाया चुकता किया जाए और कोशिश भी की जा रही है उन्हे पुनः इसी कंपनी में काम पर रखा जाए कंपनी के कर्मचारियों की वजह से ही कंपनी 24 साल उत्पादन करती रही। कंपनी काफी दिनों से बीमार है और इस वजह से कर्मचारियों का बकाया काफी ज्यादा हो गया है मील में साडे 400 सौ परमानेंट वर्कर थे 400 दैनिक कामगर थे। कर्मचारियों का पीएफ लगभग चार करोड़ बाकी है और सभी का ग्रेजुएटी लगभग 5 करोड़ बकाया है। जो रिटायर हो गए उनका ग्रेजुएटी नहीं दिया जा सका क्योंकि कंपनी के पास पैसा ही नहीं था। जो वर्कर थे उनकी तनख्वाह बाकी है जो लगभग 6 करोड रुपए है। कंपनी के सामने सबसे बड़ी बात कर्मचारियों का बकाया देना है उम्मीद है जल्द ही आने वाले रेजोल्यूशन में कोई ना कोई समाधान निकलेगा जिससे कर्मचारियों का बकाया चुकता किया जा सके। कर्नल कुशवाहा कहते हैं अपनी पेंशन से ही त्योहारों के समय जो कर्मचारी पैसे के आस में आते हैं या फिर उन्हें जरूरत होती है वह अपने पास से देते हैं उन्हें इस बात का अफसोस है कि कर्मचारियों की जिंदगी अस्थिर हो गई है अगर सरकार कुछ हस्तक्षेप करती है तो यह फैक्ट्री पुनः उत्पादन में आ जाएगी और सभी कर्मचारियों का बकाया चुकता किया जा सकेगा।
Published on:
14 Nov 2018 06:28 pm
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