लगभग 100 साल से यहां पर न तो रंग लगाया जाता है, न गुलाल उड़ाए जाते हैं, फागुन के गीत इस गांव में वर्जित है। गांव के बुजुर्गों का कहना है, उन्हें भी ये नहीं मालूम है कि कब से होली नहीं मनाई जा नही रही है, पर जबसे उन्होंने होश संभाला व अपने पूर्वजों से पूछा तो गांव में होली नहीं मनाने की बात कही गई। पूछताछ में पता चला, कई दशकों पहले गांव में होलिका दहन पर पास के जंगल से एक शेर गांव में आ गया और गांव के गौटिया (जमींदार) को उठा ले गया था।