
सदर बाजार में जर्जर भवन (Photo Patrika)
Building Safety: शहर में इस मानसून सीजन में 106 जर्जर भवन आम नागरिकों की जान के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं। नगर निगम प्रशासन हर साल की तरह इस बार भी इन भवनों के मालिकों को नोटिस जारी कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ चुका है, लेकिन धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से अधिकांश जर्जर इमारतों के मालिकों का कोई अता-पता ही नहीं है, जबकि इनके नीचे और आसपास से रोजाना हजारों राहगीर और वाहन गुजरते हैं। तेज बारिश या हवा के एक हल्के झटके से भी ये इमारतें कभी भी जमींदोज हो सकती हैं।
निगम की सूची में सिर्फ निजी मकान ही नहीं, बल्कि व्यस्ततम इलाकों की सरकारी और व्यावसायिक बिल्डिंग भी शामिल हैं। शारदा चौक स्थित रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) की बिल्डिंग इतनी जर्जर हो चुकी है कि वहां जाने वाला हर व्यक्ति डर के साए में रहता है। इस बदहाल बिल्डिंग में कई दुकानों के साथ-साथ सरकारी कार्यालयों का भी संचालन हो रहा है। इसी चौक पर एक पांच मंजिला होटल सालों से बंद पड़ा है, जिसका मालिक मुंबई शिफ्ट हो चुका है। इस पांच मंजिला इमारत के सबसे निचले हिस्से में दुकानें संचालित हो रही हैं, जबकि ऊपरी हिस्सा पूरी तरह खंडहर हो चुका है। निगम हर साल इसे सूची में तो डालता है, पर इसे ढहाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, शहर में जर्जर भवनों की संख्या में पिछले चार वर्षों में कमी आई है। वर्ष 2022 में जहां शहर में 194 जर्जर भवन चिन्हित थे, वहीं 2026 में यह संख्या घटकर 106 रह गई है। पड़ताल में सामने आया कि अधिकांश भवनों के मालिक या तो शहर छोड़ चुके हैं या फिर संपत्तियां कानूनी विवादों (कोर्ट केस) में फंसी हैं।
ज़ोन 1: 10 | ज़ोन 2: 21 | ज़ोन 3: 12
ज़ोन 4: 29 (सर्वाधिक) | ज़ोन 5: 12
ज़ोन 6: 10 | ज़ोन 7: 08 | ज़ोन 8: 00
ज़ोन 9: 02 | ज़ोन 10: 02
कोतवाली चौक, शद्दाणी चौक, शारदा चौक, अनुपम गार्डन के सामने (जीई रोड), बढ़ई पारा और पुरानी बस्ती।
नगर निगम के सर्वे में यदि किसी मकान की दीवार, छज्जा या चौखट कमजोर होकर जनसुरक्षा के लिए खतरा बनती है, तो उसे जर्जर श्रेणी में डाला जाता है। इसके बाद भवन स्वामी को नोटिस देकर मरम्मत करने या उसे ढहाने के लिए 30 दिनों का समय दिया जाता है। इस अवधि में मालिक अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है। यदि निगम आयुक्त को आपत्ति उचित नहीं लगती, तो मामला मेयर-इन-काउंसिल (MIC) के पास जाता है। एमआईसी में सुनवाई के बाद यदि आपत्ति खारिज होती है, तो भवन खाली करने के लिए 14 दिनों का अंतिम अल्टीमेटम दिया जाता है।
पिछले वर्षों के मुकाबले इस बार जर्जर भवनों की संख्या में कमी आई है। सभी ज़ोन कमिश्नरों को सख्त निर्देश जारी किए गए हैं। जिन भी भवनों से जन-माल की हानि का खतरा है, उन पर नियमतः कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
मीनल चौबे (महापौर, नगर निगम रायपुर)
Updated on:
08 Jul 2026 02:07 pm
Published on:
08 Jul 2026 02:05 pm
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