
श्रीराम-लक्ष्मण ने खाए थे कांदाडोंगर के कंदमूल
गोहरापदर। गरियाबंद जिले से लगभग 130 किमी दूर मैनपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत गोढिय़ारी में स्थित धार्मिक पर्यटन स्थल सुप्रसिद्ध पहाड़ कांदाडोंगर में प्रत्येक वर्ष चौरासीगढ़ के लोगों द्वारा विजयदशमी के दिन देव दशहरा पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता हैं।
ज्ञात हो कि मान्यता के अनुसार कांदाडोंगर में त्रेतायुग युग से निरंतर दशहरा पर्व मनाते चले आ रहे हैं। जिसके पीछे की ऐतिहासिक, धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि वनवासकाल के दौरान सीता माता की खोज में भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी दंडकारण्य कहा जाने वाले इस कांदाडोंगर पर्वत क्षेत्र में आए थे। इस पर्वत के दक्षिण दिशा में स्थित जोगीमठ में तपस्यारत ऋषि सरभंग से मिले और यहां के कंदमूल खाकर कुछ पल बिताए थे। इसी मार्ग से होते हुए भद्राचलम के लिए प्रस्थान किए थे।
कहा जाता है कि रावण वध करके जब भगवान श्रीराम अयोध्या वापस लौट रहे थे, तब इस बात की खबर सुनते ही इस क्षेत्र के चौरासीगढ़ के देवी-देवता अपना ध्वज पताका लेकर कांदाडोंगर में एकत्रित हुए थे। असत्य पर सत्य की जीत की खुशी मनाए थे। तब से लेकर आज पर्यन्त तक यह परम्परा हमेशा से चलती आ रही है। कांदाडोंगर के इसी पर्वत श्रेणी के ऊपर गुफा में चौरासीगढ़ की प्रमुख देवी मां कुलेश्वरीन विराजमान हैं। साथ में कचना ध्रुवाजी भी यहां विराजमान हैं, जिनका विजया दशमी के दिन विधि-विधान से यहां के झांकर पुजारियों द्वारा पूजा-अर्चना की जाती है। इतना ही नही, बल्कि यहां के दशहरा, मड़ई-मेला में चौरासीगढ़ के देवी-देवता अपना ध्वज पताका लेकर यहां पहुंचते हैं। लाखों की तादाद में यहां पर क्षेत्रभर के श्रद्धालुओं का तांता लगता है।
सुआ नृत्य करते हैं देवी-देवता
यहां के दशहरा पर्व की एक और विशेषता है कि इस दिन देवी-देवता सुआ नृत्य करते हैं। जिनका दर्शन कर समस्त क्षेत्रवासी आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस खूबसूरत कांदाडोंगर पर्वत में प्राकृतिक संपदा का भंडार है। साल, सागौन,इमारती लकड़ी, फलदार वृक्ष के अलावा कई जड़ी-बुटी जैसे उपयोगी सघन वन हैं। जिसके संरक्षण की विशेष आवश्यकता है। कई ऐतिहासिक मान्यताओं और लाखों श्रद्धालुओं के धार्मिक आस्था का केन्द्र होने के बावजूद आज तक कांदाडोंगर को पूर्ण पर्यटन स्थल का दर्जा नहीं मिल पाया है।
Published on:
04 Oct 2022 04:33 pm
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