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Teejan Bai Death: निधन से पहले तीजन बाई का आखिरी संदेश, पत्रिका से खास बातचीत में छत्तीसगढ़ के कलाकारों को दी सीख

Teejan Bai News: निधन से पहले पत्रिका को दिए विशेष साक्षात्कार में तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ के कलाकारों को लोककला, मेहनत और संस्कृति से जुड़े रहने का प्रेरक संदेश दिया।
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Woman performing traditional music on stage

पंडवानी गायिका तीजन बाई (Photo Patrika)

Teejan Bai Interview: छत्तीसगढ़ की शीर्षस्थ कलाकार, पंडवानी लोक शैली की स्वर कोकिला तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनका अमर स्वर हमेशा मंत्रमुग्ध करता रहेगा। पिछले दिनों जब उनके खराब स्वास्थ्य की खबरें आईं, तो खुद सामने आकर उन्होंने चाहने वालों की चिंता दूर की थी। अस्पताल से कहा था, 'देखो, मैं ठीक हूं।' लेकिन इस बार विधि को कुछ और ही मंजूर था…तीजन बाई ने बचपन से कभी स्कूल-कॉलेज का मुंह नहीं देखा, लेकिन उन पर डॉक्टरेट जैसी उपाधियां न्योछावर होती रहीं। वह छत्तीसगढ़ी बोली-भाषा की ब्रांड एम्बेसडर थीं।

देश-विदेश में मिली ख्याति

पद्मविभूषण से लेकर देश-विदेश में मिली ख्याति के बावजूद उन्हें कभी धन-दौलत जमा करने का मोह नहीं रहा। एक उपदेशक की तरह उन्होंने कहा कि लालच करना अच्छी बात नहीं है, क्योंकि लालच का घर खाली रहता है। तीजन बाई को जीवन में कोई शिकायत नहीं रही…कुछ महीने पहले उन्होंने 'पत्रिका' के राज्य संपादक गोविंद ठाकरे से कला, जीवन और छत्तीसगढ़ के भविष्य को लेकर ऐसी ही भावुक बातचीत की थी। प्रस्तुत हैं उसके अंश…

सवाल : छत्तीसगढ़ और यहां के कलाकारों के लिए आपका क्या संदेश है?

जवाब : ठेठ छत्तीसगढ़ी में बातचीत करते हुए उन्होंने अपनी दिली ख्वाहिश व्यक्त की कि छत्तीसगढ़ खूब विकास करे। सरकार और जनता के सामूहिक प्रयास से यह सबसे विकसित राज्य बने। पढ़ाई-लिखाई में आगे बढ़े। विकास में सबकी सहभागिता हो और उसका लाभ भी सबको मिले, तभी प्रदेश का असली विकास कहा जाएगा। प्रदेश में कलाकारों को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर हैं। मेहनत करके वे सम्मान के हकदार बन सकते हैं। अपना काम करते चलो, सम्मान मिले या न मिले। मेहनत रंग लाती है। मैंने जीवन में कठिन परिस्थितियों के बीच कला के लिए खुद को समर्पित किया। सब कुछ सहते हुए कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

सवाल: नई पीढ़ी और अपने शिष्यों को क्या सीख देती हैं?

जवाब : बच्चों के बीच अक्सर जाती हूं तो प्रेरणा और आशीर्वाद स्वरूप कहती हूं कि जो जिस क्षेत्र में माहिर है, उसे जतन से पकड़े रहो। पीछे मुड़कर मत देखो। हिम्मत, लगन और अपनी प्रतिभा के दम पर मैंने पंडवानी गायन किया। उसी का नतीजा है कि आज इस मुकाम पर पहुंची हूं। मैंने हजारों बच्चों को पंडवानी की शिक्षा और कला की बारीकियों का प्रशिक्षण दिया। इनमें से कुछ सिद्धहस्त कलाकार बनकर नाम भी कमा रहे हैं।

सवाल : इतनी प्रसिद्धि के बाद जीवन में क्या कुछ बदलाव आए? जीवन से कोई शिकायत?

जवाब : तंबूरा थामे हाथ से इशारा करते हुए उन्होंने बताया कि घर-परिवार के छोटे-बड़े सभी कामों में हिस्सेदार रहती हूं। सब्जी बनाती हूं और चटनी भी बनाती हूं। धान की मिंजाई और ओसाई भी कर लेती हूं। बड़ी साफगोई से कहा, "ईमानदारी से कहूं, मैं आज भी गांव की हूं। आप ही बताइए, मैं कहां से बड़ी हूं?" बच्चों और बुजुर्गों के बीच घुल-मिलकर बैठ जाती हूं। मेरा सबसे पसंदीदा छत्तीसगढ़ी भोजन बोर-बासी है। रात का पका चावल पानी में डालकर और टमाटर की चटनी मुझे बहुत पसंद है।

सवाल : जीवन की कौन-सी याद आज भी सबसे खास लगती है?

जवाब : उन्होंने बताया कि देश-विदेश घूम आई हूं, लेकिन अपने देश से खास लगाव है। खासकर छत्तीसगढ़ की विविध कला और संस्कृति मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात को याद करते हुए बताया कि उन्होंने पंडवानी सुनी और इतनी अभिभूत हो गईं कि महाभारत का प्रसंग समाप्त होने के बाद इंदिरा जी ने उनकी पीठ थपथपाई। वह पल मेरे जीवन का सबसे यादगार पलों में है।