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Analysis – सरकार जनता की है तो कामकाज पारदर्शी होना ही चाहिए

अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर खिसकाने की प्रवृत्ति की वजह से ही विधायिका और कार्यपालिका के बीच सामंजस्य नहीं बैठता और भुगतना पड़ता है जनता को..

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How transparent are people's governments

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योगेश मिश्रा @ रायपुर. स्वयं को अराजक मुख्यमंत्री कहने वाले अरविन्द केजरीवाल अब इस उपमा से छुटकारा पाने के लिए छटपटा रहे हैं। वजह है उनकी पार्टी के दो विधायकों द्वारा उनके ही निवास में दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से कथित मारपीट की घटना। विधायिका और कार्यपालिका के बीच किसी न किसी मुद्दे पर गाहे-बगाहे रस्साकसी आम बात है, लेकिन प्रजातान्त्रिक ढांचे में तालमेल की कमी का हल हाथापाई कतई नहीं है। प्रशासनिक हल्कों से निकल सत्ता का स्वाद चख रहे केजरीवाल यह भलीभांति जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं। कुर्सी जाने का भय सभी को होता है। केजरीवाल को भी है। इसलिए आनन-फानन अंशु प्रकाश के मामले को सन्दर्भ बनाकर उनकी सरकार विचार कर रही है कि कामकाज में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए हर बैठक लाइव कर दी जाए और विभागों के फाइलों की स्थिति ऑनलाइन। आश्चर्य है, अन्ना हजारे के साथ भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का बीड़ा उठाने वाले केजरीवाल को यह बोध अंशु प्रकाश के मामले के बाद हुआ।