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55 वाद्य यंत्रों के साथ देश-दुनिया में बस्तर बैंड की धूम

दल के सदस्य मुंबई में परफॉर्मेंस देकर गुरुवार को राजधानी पहुंचे

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रायपुर . [typography_font:14pt]बस्तर बैंड एक एेसा बैंड है जिसमें बस्तर की लोक एवं पारंपरिक जीवन का सांगीतिक स्वर है, जिनमें सदियों से चली आ रही संस्कृति व संगीत की गूंज है। इसमें बस्तरिया समुदाय का संस्कार गाथा, मिथ उत्पत्ति कथाएं और परम्पराओं का लयात्मक संवाद प्रचलित एवं विलुप्त होते पारंपरिक, प्रतिनिधि लोक आदि वाद्यों के माध्यम से अपनी सामूहिकता में अभिव्यक्ति होते हैं। [typography_font:14pt;" >इसके साथ ही आदिवासी लिंगो देव को अपना संगीत गुरु मानते हैं। यह मान्यता भी है कि लिंगो देव ने ही इन वाद्यों की रचना की। इसमें 'लिंगो पाटा या लिंगो पेन यानी लिंगो देव के गीत या गाथा में उनके द्वारा बजाए जाने वाले विभिन्न वाद्यों का वर्णन मिलता है। ये बातें गुरुवार को राजधानी पहुंचे बस्तर बैंड के आर्टिस्ट सोमरूनाग और निर्देशन अनुप रंजन पांडेय ने कही। उन्होंने बस्तर बैंड से जुड़ी कई दिलचस्प बातें पत्रिका प्लस से शेयर की। उन्होंने बताया कि इस समय असम और मुम्बई से बस्तर बैंड की परफॉर्मेंस देकर लौटे हैं। अब भोरमदेव महोत्सव में परफॉर्मेेंस के लिए जा रहे हैं।

विलुप्त वाद्यों को सहेजने का काम

छत्तीसगढ़ में कई एेसे वाद्य यंत्र हैं जिसे वर्षों पहले हमारे बड़े-बुजुर्ग यूज किया करते थे। लेकिन युवा पीढ़ी यंत्रों को तवज्जो ना देकर नई टेक्नोलॉजी पर ज्यादा ध्यान दे रही है। इसलिए हमारी टीम ने कुछ एेसे वाद्य यंत्रों की खोज की जो विलुप्त होने के कागार पर थी, उन्हें बचाने की काम कर रहीं है। जैसे कुछेक के बने वाद्य यंत्र लगभग विलुप्त होने के कगार पर थे लेकिन बस्तर बैंड इन वाद्यों को सहेजने का काम कर रही है। इसी कोशिश की कड़ी में बस्तर बैड शामिल है।

इन वाद्यों से होती है प्रस्तुति

बस्तर बैंड के वाद्यों में पेण्डुल ढोल, तिरडुडी, जराड़, अकुम, तोडी़, तोरम, मोहिर, देव मोहिर, नंगूरा, तुड़बुडी़, कुण्डीड़, धुरवा ढोल, डंडार ढोल, गोती बाजा, मुंडा बाजा, नरपराय, गुटापराय, मांदरी, मिरगीन ढोल, हुलकी मांदरी, कच टेहंडोर, पक टेहंडोर, उजीर, सुलुड़, बोपोर, वेरोटी, तातापूती, नेफ्ऱी, गूगुनाड़ा, बांस, चरहे, पेन ढोल, ढुसीर, कीकीड़, किंदरा, टुडरा, कोन्डोड़का, मुयांग, ढुङ्गरू, हिरनांग, झींटी, चिटकुल, किरकीचा, डन्डा, धनकुल बाजा, डुमिर, सारंगी, तुपकी, सियाड़ी बाजा, नकडेवन, पेन ढोल, ओझा परांग, वेद्दुर, गोगा ढोल आदि प्रमुख एवं संगत स्वर थाप लय सुर में प्रस्तुति की जाती हैं।