
रंगोली आर्टिस्ट प्रमोद साहू ने फिल्म के पोस्टर को रंगों से उकेरा है।
मनोज वर्मा ने एक सेमिनार में कहा था कि समाज और फिल्में एक-दूसरे से चीजें एडॉप्ट करते हैं। जरूरी नहीं कि समाज से ही फिल्मों में कुछ आए या फिल्मों से समाज इत्तेफाक रखे। ये वही मनोज वर्मा है जिन्होंने संजीव बख्शी के उपन्यास पर भूलन द मेज फिल्म बना दी। फिल्म में सिर्फ मनोरंजन होता तो तारीफ होना स्वाभाविक है लेकिन जब फिल्म हास्य और व्यंग्य के जरिए समाज और न्याय मिलने वाली प्रक्रिया पर कटाक्ष करे तो इसे नेक्स्ट लेवल का सिनेमा कहा जा सकता है। भूलन कांदा के जरिए यह संदेश दिया गया है कि हमारी न्याय व्यवस्था का पांव भी भूलन कांदा पर पड़ गया है और उसे छूकर जगाने की सख्त जरूरत है।
कहानी
कहानी फ्लेशबैक पर चलती है। भूलन कांदा के लेखक संजीव बख्शी (अशोक मिश्र)का सम्मान हो रहा होता है। इस दौरान वे बताते हैं कि बतौर टीचर वे महुआभाठा में पढ़ाने जाते हैं। इस दौरान उनका पैर भूलन कांंदा के पौधे पर पड़ जाता है। इस पेड़ पर किसी का पांव पड़ जाए तो वह सब भूलकर भटकता नजर आता है। फिर उसे कोई छू दे तो सबकुछ नॉर्मल हो जाता है। किसी तरह वह गांव पहुुंचते हैं। एक घटना में गांव के एक व्यक्ति की मौत हल के ऊपर गिरने से हो जाती है। सब मिलकर फैसला करते हैं कि भकला (ओमकारदास मानिकपुरी) की जगह गंजहा (सलीम अंसारी) को जेल भेजेंगे क्योंकि गांव में उसकी देखरेख करने वाला कोई नहीं है जबकि भकला बीवी-बच्चे वाला है। कहानी ऐसे मोड़ लेती है कि कुछ दिन बाद मामले में जांच बैठ जाती है और भकला समेत गांव के सभी लोगों को जेल जाना पड़ता है। फिल्म आखिर में सवाल छोड़ती है कि हमारे देश में कानून कौन बनाता है? हम पढ़े लिखे लोग। हम बंद एसी-कमरों में कानून बनाते हैं। कानून किसके लिए बनाते हैं? अपने जैसे पढ़े-लिखे लोगों के लिए। ये कैसी विडंबना है कि हम अपने द्वारा अपने लिए बनाए गए कानूनों को इन आदिवासी लोगों पर थोपते हैं। इन बेचारों को मानने पड़ते हैं क्योंकि इनके पास और कोई चारा नहीं है। और फिर हम इनके लिए सजा मुकर्रर करते हैं।
कहानी/स्क्रिप्ट/डायरेक्शन
कहानी भले उपन्यास पर आधारित है लेकिन उसे स्क्रिप्ट में जिस अंदाज से ढाला गया है वह काबिले तारीफ है। स्क्रीन प्ले बिल्कुल सधा हुआ है जिसमें डायरेक्शन रूपी चांदी की परत चढ़ी हुई है। सबकुछ उजला-उजला नजर आता है और इसी उजियारे में कानून व आदिवासियों के स्याह पक्ष को मजबूती से उकेरा गया है। मध्यांतर से पहले जितनी रोचकता है उसके बाद उतनी ही जिज्ञासा। रियलिस्टिक सिनेमा की खासियत यही होती है कि आप बिना छिपाए बहुत कुछ बता देते हैं।
आर्ट/ एडिटिंग/ म्यूजिक/ गीत/ मेकअप
जयंत देशमुख जैसे दिग्गज कला निर्देशक ने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया है। तुलेंद्र पटेल की एडिटिंग में कहीं कोई झोल नहीं। सुनील सोनी का संगीत रुटीन से हटकर है वहीं गीत आपको खुद से जोड़ते नजर आते हैं। टाइटल सॉन्ग प्रवीण प्रवाह और मनोज वर्मा ने लिखे हैं जबकि नंदा जाही कारे... को मीर अली मीर ने। समानंतर सिनेमा में मेकअपमैन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है जिसे गोरा ने करीने से साबित किया है।
एक्टिंग
वैसे तो फिल्म की स्टार कास्ट कमाल की है। ऐसा कहीं लगा कि इस किरदार के बजाय कोई और हो सकता था। ओमकार दास ने जिस सहजता से भकला का रोल प्ले किया है, उतनी ही शिद्दत से सलीम अंसारी ने गंजहा का व्यक्तित्व निभाया है। मुंबई की एक्ट्रेस अनिमा (प्रेमिन का रोल)ने इतनी अच्छी छत्तीसगढ़ी बोली है कि वाइस डबिंग भी उनकी ही है। कॉमेडी में संजय महानंद ने कोटवार की भूमिका में बाजी मारी। जाने-माने पटकथा लेखक अशोक मिश्र ने गहरी छाप छोड़ी है। कुछ सीन सिचुएशनल हैं जहां जिसे जो रोल मिला उसमें खुद को साबित ही किया है।
माइनस प्वाइंट
ऐसी फिल्मों में नुक्स निकालना बहुत टेढ़ी खीर होती है। बख्शी एक टीचर बनकर गांव में जाते हैं लेकिन मजाल कि कभी कोई क्लास लेते नजर आएं। एक सीन में प्रेमिन से भकला पूछ रहा होता है कि क्या बना रही हो, जबकि कढ़ाई के पास बैठा कोई भी व्यक्ति समझ जाएगा कि क्या बन रहा है। कोर्ट सीन में जज के सामने वकील मुंह में गुटखा भरकर पैरवी कर रहा होता है। फिल्म के जरिए न्याय प्रणाली पर सवाल तो लाजिमी है लेकिन यह सिर्फ आदिवासियों के लिए न होकर देश के कॉमनमैन के लिए होना चाहिए।
Published on:
27 May 2022 05:53 pm
बड़ी खबरें
View Allरायपुर
छत्तीसगढ़
ट्रेंडिंग
