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Puppet Art in Bilaspur: विलुप्ति की कगार पर कठपुतली कला को रोशनी दे रहीं बिलासपुर शहर की किरण

Puppet Art in Bilaspur: कठपुतली भारत का स्वदेशी रंगमंच है। प्राचीनकाल से ही यह लोगों के लिए उपलब्ध मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय और सराहा जाने वाला रूप रहा है।

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Puppet Art in Bilaspur: बिलासपुर। इस कला के माध्यम से किरण न सिर्फ इस विधा को सहेजने का काम कर रहीं, बल्कि सामाजिक बुराइयों के प्रति भी लोगों को जागरूक कर रही हैं। उनका कहना है कि कठपुतली कला आमतौर पर स्थानीय मिथकों, स्थानीय नायक या सामाजिक जागरुकता के विषयों पर आधारित होती है। वो कठपुतली एवं नाट्य कला मंच द्वारा इस विधा का उपयोग नशा मुक्ति, बेटी बचाओ, बाल अधिकार, गुड टच-बैड टच, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता जैसे विभिन्न विषयों पर जागरुकता के लिए भी इसका मंचन कर रही हैं।

शासन स्तर पर अनदेखी...
किरण का कहना है कि सरकार इस कला को संजोने व संवारने शासन की तरफ से कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। कलाकारों को अनुदान राशि न मिलने से कठपुतली कला मंच से जुड़े लोगों में मायूसी बनी हुई है। इससे जुड़े कुछ लोग अपने दैनिक खर्चे के लिए हमाली, मिस्त्री जैसे रोजी-मजदूरी के काम पर आश्रित हैं। इससे कलाकारों में निराशा छा रही है।

आज इससे जुड़े कलाकारों को शासन स्तर पर प्रोत्साहन न मिलने से यह कला विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई है। ऐसे में शहर की किरण मोइत्रा विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से इस कला को संजोने के साथ ही कलाकारों को प्रात्साहित कर रही हैं।

शिक्षा और मनोरंजन दोनों के लिए भारत में कठपुतलियों का इस्तेमाल लंबे समय से होता आ रहा है। बदलते परिवेश में मोबाइल व टीवी के चलते कठपुतली की कला धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। इसे नई रोशनी देने शहरवासी किरण मोइत्रा जुट गई हैं।

समय-समय पर कठपुतली एवं नाट्यकला मंच के जरिए पिछले 22 साल से अपना प्रदर्शन देते हुए इस कला को बचाने का प्रयास कर रही हैं। अपने इस प्रयास में उन्होंने शहर के 20 सुवा कलाकारों की टीम भरी बना ली है। जिन्हें साथ लेकर शायकीय कार्यक्रम को के साथ ही मेला व निजी कार्यक्रमों में भी वो प्रदर्शन कर रही हैं।

आर्थिक समस्या
किरण का कहना है कि इस कला को संवारने उन्हें आर्थिक रूप से परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कठपुतलियों को सहेज कर रखना भी मुश्किल होता है। बहरहाल वो स्वयं अपने खर्च से इस काम को कर रही हैं।